महर्षि प्रवाह

ध्यान और कर्म का उज्जवल पथ
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ब्रह्मचारी गिरीश जी
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महर्षि जी ने वेद, योग और ध्यान साधना के प्रति जन सामान्य में बिखरी भ्रान्तियों का समाधान कर उनको दूर किया। वैदिक वांङ्गमय के 40 क्षेत्रों- ऋग्वेद, समावेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, वेदान्त, कर्म मीमांसा, योग, आयुर्वेद, गंधर्ववेद, धनुर्वेद, स्थापत्य वेद, काश्यप संहिता, भेल संहिता, हारीत संहिता, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, वाग्भट्ट संहिता, भावप्रकाश संहिता, शार्ङ्गधर संहिता, माधव निदान संहिता, उपनिषद्, आरण्यक, ब्राह्मण, स्मृति, पुराण, इतिहास, ऋग्वेद प्रतिशाख्य, शुक्ल यजुर्वेद प्रातिशाख्य, अथर्ववेद प्रातिशाख्य, सामवेद प्रातिशाख्य (पुष्प सूत्रम्), कृष्ण यजुर्वेद प्रातिशाख्य (तैत्तिरीय), अथर्ववेद प्रातिशाख्य (चतुरध्यायी) को एकत्र किया, उन्हें सुगठित कर व्यवस्थित स्वरूप दिया और वेद के अपौरुषेय होने की विस्तृत व्याख्या की।


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 ध्यान और कर्म का उज्जवल पथ

प्रश्न- जो नियमित रूप से भावातीत ध्यान करते हैं उनमें भावातीत होने की स्वाभाविक योग्यता विकसित होती है और वे जीवन पोषणकारी कार्य करते हैं। यदि ऐसा है तो इसमें कौन-सी प्रक्रिया निहित है?
महर्षि- जब हम क्रियाशील रहते हैं तब भावातीत होने की आवश्यकता नहीं रहती। होता यह है कि जब हम ध्यान में प्रात:काल में भावातीत हो जाते हैं तब उसका प्रभाव क्रियाशीलता के साथ सारे दिन रहता है अब हम चाहते हैं कि वह प्रभाव हर समय बना रहे तो चाहे हम क्रियाशील रहें या निष्क्रिय, गहरी नींद में शान्त रहें या जागृत में क्रियाशील रहें हमारी वह विशुद्ध चेतना खो नहीं जानी चाहिए। वह स्थायी रूप से जीवन में स्थापित हो जाये इसके लिये जागृत की चेतना और भावातीत चेतना को बारी-बारी से अनुभव करने का क्रम बनाते हैं। हमें भावातीत होने के लिये कुछ करना नहीं चाहिए। भावातीत ध्यान की प्रक्रिया तो प्रयास रहित है।
आपने कहीं किसी ग्रंथ में पढ़ा होगा कि पहले बहुत से लोग भावातीत की चेतना को बनाये रखने का पक्ष लेते थे, कहते थे कि जब तुम काम करते हो उस समय भी भावातीत की चेतना बनाये रखने का प्रयत्न करो, परन्तु यह गलत साधनाा है। जब आप काम करते हैं तब क्रिया के क्षेत्र में हैं। क्रिया के क्षेत्र में रहने से आपको मानसिक रूप से पूरी तरह बहिर्मुखी होना चाहिए जिसमें सभी ज्ञानेन्द्रियां बाहरी क्रियाशीलता में व्यस्त रहें। ऐसी स्थिति में जब आप क्रियाशील हैं साथ ही भावातीत चेतना बनाये रखने का प्रयत्न करेंगे तब मन बंट जायेगा। मन का कुछ भाग क्रियाशीलता में रहेगा और कुछ भाग आत्मा की शान्ति कमा स्मरण करता रहेगा। यह आत्मस्मरण जिसकी वकालत पहले कई गुरुओं ने की, हानिकारक है। यह जीवन को शक्तिहीन बनाता है क्योंकि उसमें आधा मन बाहरी क्रिया में और आधा मन भीतर रहता है। मन के इस विभाजन में वह कमजोर हो जाता है। परिणाम होता है कि न तो हम पूरे क्रियाशील रह पाते हैं और न स्मरण के आधार पर आन्तरिक चेतना ही बनाये रख सकते हैं।


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