आवरण कथा

भावातीत ध्यान से आत्मकल्याण

‘ भावातीत ध्यान वास्तव में दिव्य चेतना है जिसे ईश्वर, अदृश्य शक्ति, ब्रह्मांडीय ऊर्जा आदि भी कह सकते हैं से जुड़ने का सशक्त माध्यम है। ध्यान उस ईश्वरीय शक्ति से संवाद का भी माध्यम है। प्राय: साधक ध्यान से प्राप्त होने वाली सिद्धियों एवं चमत्कारों का वर्णन बढ़ा-चढ़ा कर करते हैं किन्तु सच्चे साधक का लक्ष्य मात्र आत्मकल्याण होता है। इसके अतिरिक्त वह पीड़ित एवं दु:खी व्यक्तियों के कल्याण को प्राथमिकता देता है। ध्यान से हमारे व्यक्तित्व में जो सकारात्मक परिवर्तन आते हैं और उसके द्वारा हम अपना आत्मकल्याण करने में किस प्रकार सक्षम हो पाते हैं? ये जानने के लिए ही हम यहाँ भावातीत ध्यान से होने वाले लाभों पर विचार करेंगे। वैसे तो ध्यान करने वाला ध्यान के अनुभवों को ?गूँगे के गुड़? के समान बता पाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि ध्यान का अनुभव शब्दों में नहीं बताया जा सकता है यह मात्र अनुभूति का विषय है। ’’

भावातीत ध्यान से आत्मकल्याण

भारत की पवित्र भूमि में ऐसी अनेक दिव्य आत्माओं का अवतरण हुआ है जिन्होंने अपने ज्ञान, योग एवं अपनी विशिष्ट ध्यान पद्धतियों द्वारा भारतीय दर्शन एवं संस्कृति को सम्पूर्ण विश्व में प्रचारित एवं प्रसारित किया। एक ऐसी ही दिव्य आत्मा का जन्म इस पावन धरा पर महर्षि महेश योगी के रूप में हुआ, उनका मूल नाम महेश प्रसाद श्रीवास्तव था। उन्होंने इलाहाबाद (प्रयागराज) विश्व विद्यालय से भौतिकी स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी। अपनी कठोर साधना एवं गुरु के आशीर्वाद से उन्होंने मानव के आत्मकल्याण का जो सबसे सरल व सहज मार्ग प्रशस्त किया, उसी का नाम है- भावातीत ध्यान।
ब्रह्मलीन पूज्य महर्षि महेश योगी आधुनिक युग के आदर्श गुरु भक्त, गुरु रूप, "पूर्ण गुरु कृपा प्राप्त" वैज्ञानिक संत थे। गुरु से पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर समस्त विश्व में उस ज्ञान के उपदेश व प्रयोग द्वारा भारत के जगदगुरुत्व को चरितार्थ व वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित कर सिद्ध करने का महानतम कार्य करने वाले महान महा ऋषि थे। परम पूज्य ब्रह्मलीन महर्षि महेश योगी जी ने इस कलिकाल के गहन अज्ञान रूपी अंधकार में दिव्य ज्ञान की वह ज्योति जलायी है जो मानव जाति को सदैव पूर्ण ज्ञान प्रदान कर प्रकृति पोषित आदर्श जीवन को आलोकित कर धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति कराती रहेगी। काल के प्रभाव से जो पूर्ण वैदिक सनातन ज्ञान लुप्त प्राय हो चुका था उसे पूज्य महर्षि जी ने सम्पूर्ण विश्व में जाग्रत कर पूर्ण वैज्ञानिक आधार प्रदान कर पूनर्स्थापित किया है। महर्षि जी ने जीवन के सम्पूर्ण मनोवांछित फलों को प्राप्त करने का वह मार्ग प्रदर्शित किया है जो सरल सहज तथा सर्वोपयोगी होने से "सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान" को चरितार्थ करता है। पूज्य महर्षि जी ने वह युक्ति प्रदान की है जिससे वर्तमान युग की समस्त अशांति, दु:ख, आतंक, रोग तथा बाधाओं की त्वरित शांति होकर सम्पूर्ण विश्व में आदर्श "राम राज्य" लाया जा सकता है। उनके द्वारा पूर्ण वैदिक ज्ञान की ज्योति दिखाई गई है, जिससे जीवन के सार एवं उसकी आनन्दमयिता का वह अनुभव व ज्ञान प्राप्त हुआ है जिसे पाकर समस्त मानव जाति धन्य है।


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