आवरण कथा
‘ भारतीय स्वतंत्रता के लिए पहला राष्ट्रवादी क्रांतिकारी आंदोलन बंगाल से उभरा। बाद में इसने नवगठित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में जड़ें जमा लीं, जिसमें प्रमुख उदारवादी नेताओं ने ब्रिटिश भारत में भारतीय सिविल सेवा परीक्षाओं में बैठने के अधिकार के साथ-साथ मूल निवासियों के लिए अधिक आर्थिक अधिकारों की मांग की। 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध में स्व-शासन के प्रति अधिक क्रांतिकारी दृष्टिकोण देखा गया। स्वतंत्रता दिवस भारत में एक राष्ट्रीय अवकाश है, जिसे बड़े उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है। उत्सवों का केंद्र राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली है, जहाँ प्रतिष्ठित इमारतें और सड़कें राष्ट्रीय ध्वज के तिरंगे से सजी होती हैं। इस दिन का मुख्य आकर्षण ऐतिहासिक लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज का औपचारिक फहराना है, जिसके बाद प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन होता है। ’’
प्रतिवर्ष 15 अगस्त को, पूरा भारतवर्ष एक नई
ऊर्जा और उत्साह के साथ स्वतंत्रता दिवस का
जश्न मनाता है। यह वह दिन है जब हमारी
मातृभूमि को लगभग 200 वर्षों की लंबी गुलामी के बाद
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता मिली थी।
राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले से लेकर देश के
छोटे से छोटे गाँव तक, हर जगह उत्साह का वातावरण
होता है। प्रत्येक घर, प्रत्येक स्कूल और प्रत्येक सरकारी
भवन पर हमारा गौरव, हमारा तिरंगा पूरे शान से लहराता
है। यह जश्न सिर्फ एक छुट्टी नहीं है, बल्कि यह देश के उन
असंख्य वीरों के बलिदान और संघर्ष को याद करने का
दिन है, जिन्होंने अपने वर्तमान को हमारे भविष्य के लिए
कुर्बान कर दिया।
भारत की स्वतंत्रता की यह यात्रा दशकों के अथक
संघर्ष, यातना और बलिदान से भरी हुई थी। यह मात्र एक
राजनीतिक लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह हमारे आत्मस
म्मान, संस्कृति और पहचान को बचाने का युद्ध था।
महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन से लेकर भगत सिंह,
सुखदेव और राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों की शहादत
तक, हर एक प्रयास ने स्वतंत्रता की लौ को जलाए रखा।
रानी लक्ष्मी बाई की वीरता, सुभाष चंद्र बोस के 'तुम मुझे
खून दो, मैं तुम्हें स्वतंत्रता दूंगा' का नारा और सरोजिनी
नायडू जैसी महिला नेताओं का योगदान भारतीय स्वतंत्रता
संग्राम के स्वर्णिम अध्याय हैं। इन सभी स्वतंत्रता सेनानियों
ने एक ऐसे भारत का सपना देखा था, जहाँ हर नागरिक
को समान अधिकार और सम्मान मिले। 15 अगस्त,
1947 को, उनका यह सपना साकार हुआ, और भारत के
इतिहास में एक नए युग की शुरूआत हुई।
स्वतंत्रता मिलने के बाद, भारत के सामने उत्सव
के साथ-साथ अनेक बड़ी चुनौतियाँ भी थीं। सबसे बड़ा
और सबसे दर्दनाक मुद्दा था भारत का विभाजन। लाखों
लोगों ने अपने घर, परिवार और पहचान खो दी।
सांप्रदायिक हिंसा, शरणार्थी संकट और देश को एकजुट
रखने का कठिन कार्य तत्कालीन नेताओं के कंधों पर
था। इसके अलावा, देश को निर्धनता, निरक्षरता, भुखमरी
और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसी गंभीर समस्याओं
का भी सामना करना पड़ रहा था। लगभग 500 से अधिक
रियासतों को एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में एकीकृत
करना, संविधान का मसौदा तैयार करना और एक
मजबूत राजनीतिक और सामाजिक ढाँचा स्थापित करना
एक कठिन काम था।
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