आवरण कथा
‘ व्यास-पूर्णिमा पर ऐसे गुरु का पूजन करना चाहिए, जो ब्रह्मा के समान सद्गुणों का सर्जक हो, विष्णु के समान लोक-कल्याण की भावना से ओत-प्रोत हो तथा शिव के समान दुर्गुणों का संहारक हो। जीव और परब्रह्म को मिलाने वाले ऐसे गुरु के पास पहुँचते ही बुद्धि ग्रहणशील बन जाती है। उनकी अमृतमयी दृष्टि पड़ते ही मन की मलिनता नष्ट हो जाती है। पंक से पंकज निर्माण करने का साहस ऐसे गुरु में होता है। साधारण गुरु आशीर्वाद देने में विश्वास करते हैं किंतु सच्चा गुरु योग्य पात्र निर्मित करने में गौरव अनुभव करता है। गुरु परम्परा के दिन इसी भाव को हृदय में रखकर अंतरात्मा में उपस्थित गुरु तत्व को खोजना है, यही इस उत्सव को मनाने का ध्येय है। ’’
गुरु अनन्त अखण्ड प्रकृति का एक
सनातन तत्व है एवं गुरु देव उस
सनातन भागवत तत्व का भौतिक
अवतरण है। गुरु इस धरा पर एवं उससे परे भी
पूर्ण जीवन प्रवाह है। देवनागरी में गुरु का एक
नाम 'जीव' भी है अर्थात् गुरु वास्तव में जीवन
ही है। गुरु रचियता (ब्रह्मा), पालनकर्ता
(विष्णु) व शांति एवं सामंजस्यकर्ता (शिव)
है साथ ही वह केवल देवस्वरूप ब्रह्मा महेश ही
नहीं वरन् परम ब्रह्म स्वरूप साक्षात पूर्ण ज्ञान,
वेद, वेदांग, मूर्ति का वास्तविक स्वरूप है। गुरु
पूर्ण ज्ञान सर्वोच्च ज्ञान का उदभव करते हैं गुरु
आत्मा का, स्व का अनुभव कराता है एवं न
केवल सर्वोच्च विद्या, आध्यात्मिक विद्या
(अध्यात्म विद्या विद्यानाम) वरन साथ ही
आधिवैदिक व आधिभौतिक विद्या भी प्रदान
करते हैं।
गुरु व्यक्त व अव्यक्त का पूर्ण ज्ञान व
अनुभव प्रदान करता है। देवता तो भौतिक रूप
से दिखलायी नहीं पड़ते परन्तु गुरु सशरीर
व्यक्त रूप में अव्यक्त का पूर्ण ज्ञान व अनुभव
कराते हैं। रूप के द्वारा रहित का दर्शन कराते
हैं, गुरु वेद व वेदान्त दोनों का स्वरूप होते हैं।
श्री गुरु के चरणकमल बिन्दु रूप में प्रकृति के
सतानत तत्व का, उसकी अनन्त सम्पूर्णता व
विस्तार सहित प्रतिनिधित्व करते हैं जिससे
प्रत्येक शरणागत उसे सहज ही उसकी पूर्णता में
प्राप्त करता है। व्यक्त ब्रह्माण्ड, सृष्टि में गुरु
तत्व, गुरु ग्रह के रूप में गुरु तत्व का
प्रतिनिधित्व करता है। वेदांग ज्योतिष में गुरु
सर्वाधिक शुभ ग्रह माना जाता है, गुरु व्यक्ति
को माया के बन्धनों से मुक्त करते हैं और वह
बन्धनों को भी मुक्ति का साधन बनाकर जिससे
व्यक्ति सीमााओं में भी निस्सीमता का अनुभव
करते हैं। गुरु व्यक्ति के जीवन से सभी अशुभ
प्रभावों को समाप्त करते हैं। इसी कारण उसे
ग्रहपीड़ापहारक भी कहा जाता है अर्थात् गुरु
कृपा से ग्रहों दुष्प्रभाव प्रभावहीन हो जाते हैं।
समय-समय पर प्रकृति के नियमानुसार
आचरण न करने से विविध अशांति, रोग,
अफलता आदि से त्रस्त मानव जाति को पुन:
प्रकृति पोषित प्रकृति के नियमानुसार कर्तव्य की
शिक्षा देकर सन्मार्ग पर लाने हेतु ही प्रकृति
प्रेरणा से गुरु का धरा पर अवतरण होता है,
क्योंकि प्रकृति अधिक समय तक मनुष्य को अशांत व दु:खी नहीं रखना चाहती।
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