संपादकीय

chairman

ब्रह्मचारी गिरीश
संरक्षक संपादक

border

परफेक्ट बनने की चाहत प्राय: हमें कार्य करने से रोक देती है। विकास की मानसिकता 'ग्रोथ माइंडसेट' रखने वाले लोग गल्तियों को विफलता नहीं] बल्कि सीख मानते हैं। प्राय: हम जिसे समस्या समझते हैं] जैसे अधिक सोना या कार्यों को आगे के लिए टालना] वह किसी बड़ी समस्या के लिए लिया गया खराब निर्णय होता है। टालमटोल समय प्रबंधन की कमी नहीं] बल्कि भावनाओं पर नियंत्रण न रख पाना है। हम उस कार्य को टालते हैं] जो हमें तनाव देता है। स्वयं से पूछें कि मैं किस बात से बचने का प्रयास कर रहा हूँ? समस्या की जड़ तक पहुँचने का प्रयास करें। गल्तियों से सीखते हुए] आगे बढ़ें। स्वयं को कोसते न रहें] अपने लिए दयालु बनें। जब कुछ समझ न आए] तो बस ईमानदार हो जाइए। स्वयं से भी और दूसरों से भी। कई बार हम अपने दर्द को छिपाते हुए दूसरों के व्यवहार को सहते चले जाते हैं।


border

मानसिक स्वतंत्रता

जीवन में कई बार हम ऐसे दोराहे पर खड़े होते हैं, जहाँ प्रत्येक मार्ग धुँधला दिखाई देता है। कैरियर का चुनाव हो, संबंधों में दूरी या स्वयं को न समझ पाने की बेबसी। अनुभव बताते हैं, जब हम स्वयं के प्रति ईमानदार होते हैं और गल्तियों से डरना छोड़ देते हैं, तो मार्ग स्वमेव ही स्वच्छ होने लगता है। जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। कई बार हम स्वयं को समस्याओं में इतना फँसा हुआ पाते हैं कि बाहर निकलने का मार्ग नहीं सूझता।'हम अपनी आदतों और भय के कारण प्राय: समस्याओं में देर तक अटके रह जाते हैं। समस्या के पीछे छिपी मूल समस्या नहीं देख पाते।' अपनी समस्याओं से उबरने के लिए कुछ बातों का अभ्यास करें- आधुनिक व्यवहार विज्ञान का मानना है कि हम निपुण हैं या लापरवाह, कार्य करने से जुड़ा हमारा रवैया, सभी प्रकार के कार्य पर प्रभाव डालता है। जो लोग छोटे कामों (जैसे घर की सफाई या ईमेल का उत्तर देना) में टालमटोल या शीघ्रता करते हैं, वे बड़े जीवन निर्णयों में भी वही पैटर्न दोहराते हैं। अपनी कार्यप्रणाली सुधारें। स्वयं को व्यवस्थित करें। अगर निर्णय लेने से डरते हैं, तो छोटे-छोटे निर्णय लेकर अपना आत्मविश्वास बढ़ाएँ। ''निर्णय थेरेपी'' में एक अवधारणा है 'नकारात्मक स्पेस'। जो कहा जा रहा है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, जो नहीं कहा गया है। यदि आप अपने संबंधों में कभी क्रोध प्रकट नहीं करते या फिर कभी किसी की प्रशंसा नहीं करते, तो वह क्रोध या शिकायती स्वभाव ही वह गड्ढे हैं, जहाँ आप फँसे हुए हैं। अपनी उन भावनाओं की सूची बनाएँ] जिनका सामना करने से या जिन्हें प्रकट करने से आप बचते हैं। धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए इन्हें जीवन में सम्मिलित करें। परफेक्ट बनने की चाहत प्राय: हमें कार्य करने से रोक देती है। विकास की मानसिकता 'ग्रोथ माइंडसेट' रखने वाले लोग गल्तियों को विफलता नहीं] बल्कि सीख मानते हैं। प्राय: हम जिसे समस्या समझते हैं] जैसे अधिक सोना या कार्यों को आगे के लिए टालना] वह किसी बड़ी समस्या के लिए लिया गया खराब निर्णय होता है। टालमटोल समय प्रबंधन की कमी नहीं] बल्कि भावनाओं पर नियंत्रण न रख पाना है। हम उस कार्य को टालते हैं] जो हमें तनाव देता है। स्वयं से पूछें कि मैं किस बात से बचने का प्रयास कर रहा हूँ? समस्या की जड़ तक पहुँचने का प्रयास करें। गल्तियों से सीखते हुए] आगे बढ़ें। स्वयं को कोसते न रहें] अपने लिए दयालु बनें। जब कुछ समझ न आए] तो बस ईमानदार हो जाइए। स्वयं से भी और दूसरों से भी। कई बार हम अपने दर्द को छिपाते हुए दूसरों के व्यवहार को सहते चले जाते हैं। हमें यह अधिकार है कि यदि हमें कष्ट हो रहा हो, तो हम प्रतिकार कर सकते हैं। यह अपराध नहीं है वरन् चुपचाप कष्ट सहन करना एक अपराध है। सर्वथा उचित है आवाज उठाना] यह हमारा स्वयं के प्रति कर्त्तव्य है। ऐसा माना जाता है जो स्वयं के अधिकारों के लिए लड़ नहीं सकता वह दूसरों के लिए कैसे खड़ा होगा? प्रत्येक व्यक्ति का आत्मरक्षा का अधिकार प्रकृति प्रदत्त है मानसिक असमर्थता या भय भी हमें स्वयं के प्रति न्याय से वंचित करता है। अत% स्वयं के अधिकारों और कर्त्तव्यों के प्रति सचेत रहें। यह हमारे आत्मबल को बढ़ाता है। साथ ही भावातीत ध्यान का नियमित प्रात% एवं संध्या को 15 से 20 मिनट का अभ्यास आपको-अपने अधिकारों एवं कर्त्तव्यों के प्रति सजग बनाने में सहायक सिद्ध होगा।



।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।