संपादकीय

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ब्रह्मचारी गिरीश
संरक्षक संपादक

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मनुष्य को अपने आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिए। यह यात्रा सरल नहीं है। संसार के आकर्षण और भीतर की कमजोरियाँ साधक को बार-बार उसके लक्ष्य से भटकाने के प्रयास करती हैं। इसलिए गीता पलायन का नहीं, संघर्ष का संदेश देती है। यह संघर्ष किसी अन्य के विरुद्ध नहीं, बल्कि उन प्रवृत्तियों के विरुद्ध है, जो मनुष्य को उसके श्रेष्ठ स्वरूप से दूर ले जाती हैं।


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आंतरिक आकांक्षा एवं बाहरी परिस्थितियों का संतुलन

हमने कभी इस प्रश्न पर गौर किया है कि भगवान कौन हैं? भगवान शब्द की एक सुंदर व्याख्या है- जो 'भग'का स्वामी है, वही भगवान है। वैदिक परंपरा में 'भग' के अनेक अर्थ मिलते हैं। एक अर्थ है, दिव्य प्रभा, दूसरा है मूल कारण और तीसरा अर्थ छह विशिष्ट गुणों के समुच्चय से जुड़ा है, यानी- ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य- के समुच्चय को भग कहा गया है। जो इन छहों का स्वामी है, वही 'भगवान' कहलाता है। पहला गुण है ऐश्वर्य। इसका अर्थ केवल धन-संपत्ति नहीं, बल्कि आध्यात्मिक या दिव्य सामर्थ्य है। जिसके पास ऐसी शक्ति है, उसे 'ईश्वर' कहा गया है। दूसरा है वीर्य। इसे यहाँ शारीरिक शक्ति से कहीं व्यापक अर्थ में समझना चाहिए। यह है सामर्थ्य, धैर्य और कठिन परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य पर टिके रहने की क्षमता। तीसरा गुण है, यश-प्रतिष्ठा या कीर्ति, लेकिन आध्यात्मिक संदर्भ में यह मात्र सांसारिक प्रसिद्धि नहीं है, बल्कि ऐसा प्रभाव है, जो व्यक्ति के श्रेष्ठ कर्मों और व्यक्तित्व से उत्पन्न होता है। चौथा है श्री। सामान्यत: इसे सौंदर्य या आकर्षण के अर्थ में लिया जाता है, पर इसका अर्थ कहीं गहरा है। श्री वह सक्रिय आकर्षण है, जो ऊर्जा को गति देता है। शायद यही कारण है कि भारतीय परंपरा में सम्मान और मंगल की भावना से नाम के आगे 'श्री' लगाने की परंपरा रही है। पाँचवाँ गुण है ज्ञान, विशेष रूप से आध्यात्मिक ज्ञान। मात्र सूचनाओं का संग्रह ज्ञान नहीं है। वास्तविक ज्ञान वह है, जो मनुष्य को स्वयं के स्वरूप और जीवन के परम उद्देश्य का बोध कराए। छठा है 'वैराग्य' इसे मात्र संसार छोड़ देना समझना उचित नहीं होगा। 'राग' का एक अर्थ रंग या आकर्षण है। इसलिए वैराग्य का अर्थ है, संसार के आकर्षक रंगों से प्रभावित होकर अपने मूल लक्ष्य से विचलित न होना। इन छह गुणों का संतुलित व पूर्ण समुच्चय भग है और जो इस भग का स्वामी है, वह भगवान है। इस दृष्टि से साधना मात्र भगवान को पाने की यात्रा नहीं, बल्कि अपने भीतर इन दिव्य गुणों को विकसित करने की प्रक्रिया भी है। इसीलिए गीता मात्र कोई प्राचीन उपदेश नहीं है। यह मनुष्य को आगे बढ़ने का आान है। इसका जो इन छह गुणों का स्वामी है, वह भगवान है। इस दृष्टि से साधना मात्र भगवान को पाने की यात्रा नहीं, बल्कि अपने भीतर दिव्य गुणों को विकसित करने की प्रक्रिया भी है। संदेश है कि मनुष्य को अपनी आंतरिक आकांक्षा और बाहरी परिस्थितियों के बीच उचित संतुलन बनाते हुए अपने आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिए। यह यात्रा सरल नहीं है। संसार के आकर्षण और भीतर की कमजोरियाँ साधक को बार-बार उसके लक्ष्य से भटकाने के प्रयास करती हैं। इसलिए गीता पलायन का नहीं, संघर्ष का संदेश देती है। यह संघर्ष किसी अन्य के विरुद्ध नहीं, बल्कि उन प्रवृत्तियों के विरुद्ध है, जो मनुष्य को उसके श्रेष्ठ स्वरूप से दूर ले जाती हैं। 'रामायण' हमें यह सीख देती है कि कैसे एक राजकुमार ने संघर्ष, दृण निश्चय, वृतधारी, संयमित, मर्यादित होकर स्वयं में उन गुणों का समावेश किया। जिसने उन्हें राजकुमार से हमारा भगवान बनाया। महाभारत में द्वारकाधीश ने समस्त बाधाओं को अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व के आधार पर 'आताताइयों' का वध कर आनंद का प्रचार-प्रसार किया। यह हमें प्रेरित करता है देनिन्दिन प्रवृत्तियों पर हम नियंत्रण एवं संयम से विजय प्राप्त कर सकते हैं। इस विजय यात्रा के सहयात्री के रूप में परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी ने ''भावातीत ध्यान योग'' को प्रतिपादित कर आनंदित जीवन को सुगम एवं सरल बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है। 10 से 15 मिनट प्रात: एवं संध्या के समय, प्रतिदिन नियमित रूप से इसका अभ्यास कर हम हमारे जीवन की समस्त दिशाओं में आनंद का प्रवाह कर जीवन को आनंदित बना सकते हैं क्योंकि जीवन संघर्ष नहीं जीवन आनंद है।



।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।