संपादकीय

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ब्रह्मचारी गिरीश
संरक्षक संपादक

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''आप जो कुछ भी करना चाहते हैं, उसकी सफलता का बीज आपकी चेतना में है। 'मेरा शरीर भले ही टूट जाए, परंतु चेतना रूपी मेरा संकल्प झुक नहीं सकता!' वह चेतना की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति को प्रदर्शित करता है।'' जागृत चेतना ही आपको दिव्य बनाती है। जब आप उस चेतना का प्रयोग करना बंद कर देते हैं, तो आप नश्वर मानव बन जाते हैं। बहुत-से लोग कहते हैं कि हमें अपनी चेतना का प्रयोग परिस्थितियों के परिवर्तन के लिए नहीं करना चाहिए। चेतना के बिना आप मात्र एक यंत्रवत व्यक्ति बन जाएँगे। मनुष्य को वासनाओं के अधीन रहने वाली अपनी चेतना को झुकाकर ईश्वरीय चेतना के साथ जोड़ना सीखना चाहिए। जब दृढ़ता से उचित प्रार्थना की जाती है, तो वह चेतना है। आप जिस परिणाम के लिए ध्यान कर रहे हों, उसकी संभावना में आपको पूर्ण विश्वास होना चाहिए।


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अहं के त्याग से परिवर्तन

एक नदी पहाड़ों से बहते हुए जंगलों, गाँवों और शहरों को पार करती हुई एक विशाल रेगिस्तान के किनारे तक पहुँची। उसने अब तक हर बाधा को पार किया था, इसलिए उसे लगा कि वह रेगिस्तान को भी पार कर लेगी। जैसे ही उसने रेत पर कदम रखा, उसे अनुभव हुआ कि उसका पानी गायब होता जा रहा है। रेत उसका पानी सोख रही थी। नदी इस बात से विचलित हो गई। उसे लगा कि उसका अस्तित्व अब समाप्त होने वाला है। तभी रेगिस्तान ने उससे कहा, 'आगे बढ़ो नदी, हवा रेगिस्तान पार कर सकती है तो तुम भी।' नदी ने चिल्लाकर कहा, 'किंतु मैं जब भी आगे बढ़ती हूँ, रेत मुझे निगल जाती है। हवा तो उड़ सकती है, मैं तो भूमि पर बहती हूँ।' रेगिस्तान ने कहा, 'तुम अपनी पुरानी जिद और पुराने स्वरूप को पकड़े हुए हो। इस प्रकार तुम कभी पार नहीं कर पाओगी।' नदी ने पूछा, 'क्या भाप बनने के बाद मैं वही 'मैं' रहूँगी? क्या मेरा स्वरूप खो नहीं जाएगा?' रेगिस्तान ने कहा, 'तुम्हारा स्वरूप बदल जाएगा, पर तुम्हारी असलियत समाप्त नहीं होगी। तुम आज भी पानी हो और भाप बनने के बाद भी पानी ही रहोगी। अगर तुम 'नदी' होने के अहं को नहीं छोड़ोगी, तो तुम यहीं सूखकर कीचड़ बन जाओगी और हमेशा के लिए खत्म हो जाओगी।' नदी ने बहुत सोच-विचार किया। अंतत: उसने अपना भय छोड़ दिया। वह भाप बनकर ऊपर उठ गई। हवा उसे धीरे से उठाकर कोसों दूर पहाड़ों के पार ले गई। वहाँ, वह फिर से बरसी और पहले से भी अधिक विशाल नदी के रूप में बहने लगी। परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी कहते थे कि ''आप जो कुछ भी करना चाहते हैं, उसकी सफलता का बीज आपकी चेतना में है। 'मेरा शरीर भले ही टूट जाए, परंतु चेतना रूपी मेरा संकल्प झुक नहीं सकता!' वह चेतना की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति को प्रदर्शित करता है।'' जागृत चेतना ही आपको दिव्य बनाती है। जब आप उस चेतना का प्रयोग करना बंद कर देते हैं, तो आप नश्वर मानव बन जाते हैं। बहुत-से लोग कहते हैं कि हमें अपनी चेतना का प्रयोग परिस्थितियों के परिवर्तन के लिए नहीं करना चाहिए। चेतना के बिना आप मात्र एक यंत्रवत व्यक्ति बन जाएँगे। मनुष्य को वासनाओं के अधीन रहने वाली अपनी चेतना को झुकाकर ईश्वरीय चेतना के साथ जोड़ना सीखना चाहिए। जब दृढ़ता से उचित प्रार्थना की जाती है, तो वह चेतना है। आप जिस परिणाम के लिए ध्यान कर रहे हों, उसकी संभावना में आपको पूर्ण विश्वास होना चाहिए। आपको उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए रचनात्मक कार्यों द्वारा चेतना को निरंतर प्रयुक्त करते जाना होगा। जब आप असफलताओं से हार माने बिना निरंतर प्रयास करते रहेंगे, तो आपकी मनोकामना पूर्ण हो जाएगी। जब आप निरंतर अपने विचारों और कार्यकलापों में उस चेतना का प्रयोग करते रहते हैं, तो जिसकी आप कामना कर रहे हों, उसे साकार होना ही पड़ेगा। यदि आपकी इच्छा के पूर्ण होने का कोई तरीका दुनिया में न हो, तब भी अगर आपकी चेतना निरंतर जागृत बनी रहती है, तो इच्छित परिणाम किसी-न-किसी तरह प्रकट हो ही जाएगा। इस प्रकार की चेतना में ही ईश्वर का उत्तर होता है, क्योंकि चेतना ईश्वर से ही आती है। अखंड चेतना दैवीय चेतना है। अपनी चेतना को विकसित करने की उत्सुकता में तुरंत बड़े कार्यों को न लें। सफल होने के लिए पहले अपनी चेतना को किसी ऐसे छोटे कार्य में उपयोग कीजिए, जिसके बारे में आप सोच रहे हों कि आप उसे नहीं कर सकते। यदि आप उस पर कठिन परिश्रम करते हैं, तो आप सफल हो सकते हैं। क्या आपको वे सभी लक्ष्य याद हैं, लक्ष्य जिनके बारे में आपके मित्र और अन्य कई लोग आपको बताते हैं कि तुम उनमें कभी सफल नहीं हो सकते। आप प्रयास कीजिये। अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को एकत्रित कीजिए तन-मन का सौ प्रतिशत, आप सकारात्मकता के साथ पुन: प्रयास कीजिये निश्चित रूप से आप अपने सामर्थ्य में एक नवीन ऊर्जा का अनुभव करेंगे। अपनी चेतना को जागृत करने के लिये परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रतिपादित भावातीत ध्यान का नियमित रूप से प्रात: एवं संध्या 15 से 20 मिनट का अभ्यास निश्चय ही हमारे मन-मस्तिष्क में सकारात्मकता को उत्पन्न करता है और हमारी चेतना को जागृत कर हमारे समर्थ्य को बढ़ाता है। हमें हमारे आत्मविश्वास एवं आनंद से परिचय कराता है क्योंकि 'जीवन आनंद है।'



।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।