महर्षि प्रवाह

समय की सीख
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ब्रह्मचारी गिरीश जी
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हमारे विचार से तो समय जीवन की सबसे बड़ी सीख का स्मरण करा रहा है कि जीवन का कोई ठिकाना नहीं है। कब किस कारण से जाना पड़ जाये, पता नहीं। एक छोटा सा, अदृश्य कारण 200,000 व्यक्तियों का जीवन संक्षिप्त काल में ले गया और आगे कितनों को और समेट लेगा, यह किसी को पता नहीं है। विश्व के शीर्षस्थ वैज्ञानिक इसकी प्रकृति, संरचना, व्यवहार, प्रभाव और काट को लेकर अनुसंधान में रात-दिन एक किये हैं, चार माह हो चुके हैं लेकिन अंतिम परिणाम पर समय बहुत बलवान होता है, अपने-अपने समय के बड़े-बड़े सूरमाओं का आज नामो निशान नहीं है। एक गीत में सुना कि अपने समय में जिनकी इच्छा अथवा आज्ञा के बिना उनके साम्राज्य का एक पत्ता भी नहीं हिलता था, वे राजे-महाराजे चक्रवर्ती जो अपने परिवार के हर सदस्य की मृत्यु पर भव्य स्मारक बनवा दिया करते थे, उनका स्वयं का अंतिम संस्कार कहाँ हुआ, ये किसी को ज्ञात नहीं है। समय से कोई विजयी नहीं हो पाया। ऐसा लगता है कि समय, इतिहास और प्रकृति ये तीनों एक ही परिवार के अत्यन्तघनिष्ठ सम्बन्धी हैं। जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह इन तीनों के द्वारा या इन तीनों के संज्ञान में हो रहा है।


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 समय की सीख

समय की सीख समय पर ले लेनी चाहिए, ऐसा वयोवृद्ध और ज्ञानी महापुरुषों का मार्गदर्शन है। अक्षरत: सत्य है। कोरोना का समय आया, सारे विश्व में हाहाकार मचा है। मृत्यु का आँकड़ा दो लाख पार कर गया है, किसी को कुछ सूझ नहीं रहा है, अफवाहों का बाजार गरम है। अभी तक सुनते थे, जितनी मुँह उतनी बातें अब सुन रहे हैं हर मुंह से हजारों बातें। संकट के काल में भी अक्ल ठिकाने नहीं लग रही है। ओछी राजनीति छूट नहीं रही है, दोषारोपण पराकाष्ठा पर है, निकम्मे कर्मठों पर आरोप लगा रहे हैं, कर्मठ अपनी चिन्ताओं से परेशान हैं, उन्हें ढांढस बधाने वाला कोई नहीं है, वे अलग-थलग पड़ गये हैं, दिन और रातें योजना और निर्णय के लिये कम पड़ गये हैं।
कहते हैं समय बहुत बलवान होता है, अपने-अपने समय के बड़े-बड़े सूरमाओं का आज नामो निशान नहीं है। एक गीत में सुना कि अपने समय में जिनकी इच्छा अथवा आज्ञा के बिना उनके साम्राज्य का एक पत्ता भी नहीं हिलता था, वे राजे-महाराजे चक्रवर्ती जो अपने परिवार के हर सदस्य की मृत्यु पर भव्य स्मारक बनवा दिया करते थे, उनका स्वयं का अंतिम संस्कार कहाँ हुआ, ये किसी को ज्ञात नहीं है। समय से कोई विजयी नहीं हो पाया। ऐसा लगता है कि समय, इतिहास और प्रकृति ये तीनों एक ही परिवार के अत्यन्तघनिष्ठ सम्बन्धी हैं। जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह इन तीनों के द्वारा या इन तीनों के संज्ञान में हो रहा है। वैसे दोष तो ब्रह्मा जी को दिया जाता है कि सब कुछ उन्हीं का लिखा हुआ है। भगवान विष्णु के विरोधी भी कम नहीं हैं, सब कुछ उनकी ही माया से घटित हो रहा है, ऐसा दोष उन पर मढ़ दिया जाता है। रुचिकर बात यह है कि न ब्रह्मा दिखते हैं, न विष्णु दिखते हैं, न ही अपनी बातों का कोई प्रभाव उन पर दिखता है और न ही उनकी ओर से कोई उत्तर आता है। रही बात प्रकृति की तो वह प्रतिक्रिया दिखाये बिना नहीं छोड़ती। वह तो भगवान ने गीता में कह दिया 'मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते स चराचरम'। भगवान विष्णु कुछ नहीं करते। वे तो क्षीर सागर में नागराज की शैया पर योगनिद्रा का आनन्द लेते हैं और सम्पूर्ण चराचर जगत में उनकी प्रकृति उनके कार्य- उनके द्वारा रचित माया को आकार देती रहती है। समय को निर्दोष माना जा सकता है, जैसीजै सी प्रभु की लीला, वैसे-वैसे वह कार्य सम्पादन करता रहता है। हाँ उसे शिक्षक की भूमिका में रख देना शायद गलत नहीं होगा। सीख देने में समय की ही बड़ी भूमिका है। और इतिहास? उसकी कोई विशेष भूमिका योजना की रचना करने, कार्यान्वयन करने, शिक्षा देने, इनमें से किसी भी क्षेत्र में तो नहीं प्रतीत होती। वो तो बस जब कार्य की इति हो जाती है तो उसको रिकार्ड में रख लेता है। अत: इतिहास दोष देने लायक नहीं है।
जैसा किसमय की भूमिका के विषय में विचार किया, इससे सीख तो निश्चितरूप में मिलती है। ये सबके जीवन का संचालन रिमोट से करता है, दिखता नहीं है और अमिट प्रभाव छोड़ता है, किसी को छोड़ता नहीं है, किसी को क्षमा भी नहीं करता, शायद धर्मराज-यमराज और चित्रगुप्त इसके निकट के सम्बन्धी हैं। ये अवश्य देखा गया कि जो अपने जीवन में प्रकृति का पोषण करता है प्रकृति उसका पोषण करती है। इसी प्रकार यह भी निश्चित ही है कि जो समय के प्रति सम्मान रखते हुये, उसके नियमों का पालन करते हुये, उसे साथ लिये हुये चला, समय उसके लिये अनुकूल रहा, शुभफलदायक रहा, अच्छी सीख देता रहा, सावधान करता रहा और अंत में सद्गति भी देता रहा। सदा से यह शाश्वत सत्य रहा है, आज भी है और कल भी रहेगा क्योंकि समय सर्वाधिक बलवान है। आज की परिस्थिति में समय हमें क्या सीख दे रहा है, आइये इस पर थोड़ा विचार कर लें।


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