महर्षि प्रवाह

गति का आधार
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ब्रह्मचारी गिरीश जी
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महर्षि जी ने वेद, योग और ध्यान साधना के प्रति जन सामान्य में बिखरी भ्रान्तियों का समाधान कर उनको दूर किया। वैदिक वांङ्गमय के 40 क्षेत्रों- ऋग्वेद, समावेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, वेदान्त, कर्म मीमांसा, योग, आयुर्वेद, गंधर्ववेद, धनुर्वेद, स्थापत्य वेद, काश्यप संहिता, भेल संहिता, हारीत संहिता, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, वाग्भट्ट संहिता, भावप्रकाश संहिता, शार्ङ्गधर संहिता, माधव निदान संहिता, उपनिषद्, आरण्यक, ब्राह्मण, स्मृति, पुराण, इतिहास, ऋग्वेद प्रतिशाख्य, शुक्ल यजुर्वेद प्रातिशाख्य, अथर्ववेद प्रातिशाख्य, सामवेद प्रातिशाख्य (पुष्प सूत्रम्), कृष्ण यजुर्वेद प्रातिशाख्य (तैत्तिरीय), अथर्ववेद प्रातिशाख्य (चतुरध्यायी) को एकत्र किया, उन्हें सुगठित कर व्यवस्थित स्वरूप दिया और वेद के अपौरुषेय होने की विस्तृत व्याख्या की।


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 गति का आधार

'संसरति इति संसार', जिसमें प्रत्येक वस्तु प्रत्येक क्षण गति कर रही हो, स्थिर न हो वह संसार है। नाम में ही संसार का स्वरूप समझा दिया गया है। हम अपने चारों ओर देखें, क्या देखते हैं? बाहर आदमी-पशु चल रहे हैं, साइकि ले, मोटर, बसें, ट्रक दौड़ रहे हैं। लोहे की पांतो पर रेल गांड़ियाँ भाग रही हैं। मनुष्य यहाँ से वहाँ जाने में संतुष्ट नहीं है, वे कम से कम समय में अधिक से अधिक दूरी तय कर लेना चाहते हैं। तीव्र गति वाले वाहनों का आविष्कार तीव्रता से हो रहा है। वायु-यात्रा इसीलिये लोकप्रिय है कि जिन स्थानों में जल और थल से सप्ताह और महिनों में पहुँचा जाता था, वहाँ पहुंचने में मात्रा कुछ ही घंटे लगते हैं। जो बाहर है वही भीतर है। एक-एक क्षण हमें बाल्यावस्था से युवावस्था, युवावस्था से वृद्धावस्था और वृद्धावस्था से मृत्यु की ओर ले जा रहा है। शरीर में रक्त धमनियों में दौड़ रहा है। विचार निरन्तर एक के पश्चात् एक उठते जाते हैं और दूसरे क्षण दूसरा विचार आ जाता हैं। घड़ी में बारह बजा, हमने घड़ी देखी और एक सेकंड हो गया। प्रत्येक क्षण इतनी शीघ्र परिर्वतन होता है कि हम किसी स्थिति को पकड़ नहीं पाते।
उद्यान में हमको एक पुष्प पसंद आया, हमने उसे तोड़ा और घर ले आये। अब वह फूल नहीं है जो हमें पसंद आया था, वह भी नहीं है जो हमने तोड़ा था। इतना ही क्योें हम भी वह नहीं है जो उद्यान में गये थे अथवा जिन्होंने फूल तोड़ा था। परिर्वतन इतना सूक्ष्म होता है कि हम उसे समझ नहीं पाते। गति स्वतंत्र है अथवा उसका आधार है। मोटर इत्यादि वाहन दौड़ते हैं पर जिस सड़क पर यह भाग-दौड़ हो रही है वह तो स्थिर है। अस्थिरता को स्थिरता का आधार चाहिए। रेलें दोड़ती हैं परन्तु लोहे की पांते स्थिर हैं। जहाँवे यहाँ से वहाँहुई और दुर्घटना हुई। जितनी सशक्त और स्थिर सड़क होगी उतनी ही तेजी से वाहन भागेंगे। सिनेमाघरों में हम हजारों रंग-बिरंगे चित्रों को भागते, दौड़ते, नाचते, गाते, मरते, जीते देखते हैं परन्तु जिस पर्दे पर वह सब हो रहा है, वह पर्दा तो नितान्त स्थिर है। वह जरा हिला और रंग में भंग हुआ। उस पर हजारों रंग दिखते हैं, पर वह स्वयं सफेद है, उसका कोई रंग नहीं है। हम चलते हैं, एक पैर जब हम स्थिार कर लेते हैं तब दूसरा उठाते हैं। घड़ी के कांटे निरन्तर घूमते हैं पर जिस डायल पर वे घूमते हैं, वह स्थिर हैं। दोनों चक्के घूमते हैं। चक्की का पाट इसलिए घूमता है क्योंकि उसे स्थिर पाट का आधार है। इसी प्रकार हमारे अन्त: स्थल में स्थायी, अपरिर्वतनशील आधार है, जिस पर समस्त कार्यवाही हो रही है।


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