महर्षि प्रवाह

महर्षि सिद्ध निर्माण योजना
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ब्रह्मचारी गिरीश जी
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महर्षि जी ने वेद, योग और ध्यान साधना के प्रति जन सामान्य में बिखरी भ्रान्तियों का समाधान कर उनको दूर किया। वैदिक वांङ्गमय के 40 क्षेत्रों- ऋग्वेद, समावेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, वेदान्त, कर्म मीमांसा, योग, आयुर्वेद, गंधर्ववेद, धनुर्वेद, स्थापत्य वेद, काश्यप संहिता, भेल संहिता, हारीत संहिता, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, वाग्भट्ट संहिता, भावप्रकाश संहिता, शार्ङ्गधर संहिता, माधव निदान संहिता, उपनिषद्, आरण्यक, ब्राह्मण, स्मृति, पुराण, इतिहास, ऋग्वेद प्रतिशाख्य, शुक्ल यजुर्वेद प्रातिशाख्य, अथर्ववेद प्रातिशाख्य, सामवेद प्रातिशाख्य (पुष्प सूत्रम्), कृष्ण यजुर्वेद प्रातिशाख्य (तैत्तिरीय), अथर्ववेद प्रातिशाख्य (चतुरध्यायी) को एकत्र किया, उन्हें सुगठित कर व्यवस्थित स्वरूप दिया और वेद के अपौरुषेय होने की विस्तृत व्याख्या की।


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 महर्षि सिद्ध निर्माण योजना

कितने इनके गुण हैं? वो सारे उस अव्यक्त, निर्गुण, निराकार, शुद्ध चेतन सत्ता के प्रस्फुटन हैं। उसी का यह संसार बना है। कै से बना? कैसे वह निर्गुण निराकार सत्ता से सगुण साकार बना? ठीक उसी प्रकार जैसे यह निर्गुण निराकार रस से, बिना रंग के रस से यह फूल बन गया, ये डंठल बन गया क्या हुआ तब यह फूल बना? सबसे पहली बात तो हुई वो यह हुआ कि उस रस की सत्ता में कुछ क्रिया होना शुरू हो गयी। रस अभी फूल नहीं बना? डाली या डंठल बना नहीं, अभी रस तो रस ही है। अर्थात् अभी अव्यक्त ही है। अभी कोई रंग उसका लिया नहीं।, बेरंग का है। लेकिन यह बेरंग का रहते हुए भी भीतर से कुछ क्रियाशील तो होने लगा है। उसमें क्षेत्र में ही अपने अपा में कुछ क्रिया होनी शुरू हो गयी। अर्थात् अव्यक्त निर्गुण निराकार क्षेत्र में ही अपने आप में कुछ क्रिया का स्पंदन हुआ। कुछ क्रिया होने लगी, और वो अभी अव्यक्त है, अभी व्यक्त नहीं हुई। तो उसी क्रिया के सहारे अब वो फिर से व्यक्त होना शुरू हुआ और यह बन गया, यह बन गया। तो शुद्ध चेतन सत्ता में क्रिया हुई।

अभी वो शुद्ध चेतन सत्ता अव्यक्त है। व्यक्त हुई नहीं। वो अव्यक्त चेतन सत्ता में जो क्रिया हुई, वो क्रिया ही वेद की ऋचाएं हैं और उस क्रिया में क्या हुआ? उस क्रिया में नियमों का संचालन हुआ। अब जैसे रस, रस के भीतर क्रिया होना प्रारंभ हुई तो जो हुआ शुरू हुई तो जो हुआ, वो जो भिन्न भिन्न गुण हैं, वो भिन्न-भिन्न गुण अपने-अपने ढंग से कुछ बतरने लगे, कुछ क्रिया होने लगी, कुछ रजोगुण, सतोगुण। कुछ ये, कुछ वो, तो ऋग्वेद कहता है कि 'ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्, यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदु:।' जो परमेव्योमन भाव के परे शुद्ध चेतन सत्ता जो है वो अक्षर सत्ता ऋचो अक्षरे उस अक्षर सत्ता का स्पंदन जो है, वो ऋचाएं हैं और उसमें क्या है? यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदु: उसमें सारे विश्व ब्रह्मांड का सृजन, पालन और संहार करने वाले देवी देवताओं की सत्ता है। वो सारे विश्व के नियम, वो सारे विश्व के नियमों के अधिष्ठाता देवता, इसका सृजन करने वाले, पालन करने वाले, संहार करने वाले सारे विश्व ब्रह्मांड की, सृजन कत्री, पालन कत्री, संहार कत्री जो शक्तियों हैं- क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति। सारे के सारे देवी-देवताओं का, सारे दैवीय जगत का वो क्षेत्र निवास स्थल है। यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदु:, यह काम की चीज है। इसलिए कह रहे हैं कि ज्ञानयुग है।


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