अनुक्रमणिका

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भावातीत ध्यान और भक्ति


भावातीत ध्यान और भक्ति

भावातीत ध्यान ही भक्ति का क्षेत्र है। जिनको भी कहीं भगवान शिव का दर्शन हुआ और उस दर्शन से प्राप्त उनकी प्रज्ञा हुई, उनको बराबर भगवान का दर्शन हुआ, उनको बराबर देवी का दर्शन हुआ। एक का दर्शन होने से एकहि साधे सब सधे यह जो उत्तरप्रदेश की कहावत है कि एक को साध लो तो सब सध जाता है। चाहे भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा जागती है, भगवान विष्णु की आराधना के अपने यहाँ कितने सुगम तरीके हैं। सबके कुलगुरुहोते हैं, गुरुओं से मंत्र मिलता है।....

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हमारा व्यक्तित्व हो संतुलित और परिपक़्व


हमारा व्यक्तित्व हो संतुलित और परिपक़्व

अपरिपक्व विचार वाले व्यक्ति मन में छोटी- छोटी बातों की गाँठ बनाकर संबंधों को तोड़ लेते हैं, सदैव दूसरों को गलत सिद्ध करने में लगे रहते हैंऔर वे स्वयं को सुधारने के स्थान पर यह अपेक्षा करते हैं कि दूसरे पहले सुधरें। ऐसे लोग ही हमारे समाज में अधिक मिलेंगे पर हमें यह निश्चित करना है कि हम अपना व्यक्तित्व कैसा बनाना चाहते हैं? अब हमारे मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि संतुलित और परिपक्व व्यक्तित्व वाले बनने से हमें क्या लाभ होगा? ऐसा करके हम अपने मानव जीवन को सार्थक कर पायेंगे।...

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विद्यार्थियों की चेतना जाग्रति द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा


विद्यार्थियों की चेतना जाग्रति द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा

आत्म-ज्ञान एवं अनुभव वास्तव में सबसे महत्वपूर्ण मानव अधिकार है जो भावातीत ध्यान से सरलता से प्राप्त होता है। जब हम अक्षर ज्ञान कहते हैं तो यह केवल अक्षर बोलने व लिखने तक ही सीमित नहीं वरन् अपनी आत्मा की अनन्तता 'अ' का अनुभव और उस आत्मा की अनन्तता के क्षरण(प्रकृटीकरण) को समस्त प्रकृति में अनुभव करने का ज्ञान है।...

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श्रीमद्भगवदगीता में प्रतिपादित शान्ति प्राप्त करने के उपाय


श्रीमद्भगवदगीता  में प्रतिपादित शान्ति प्राप्त करने के उपाय

एक छोटे से गोप-बालक के रूप में भगवान् श्री बिल्वमंगलजी के पास आाकर अपनी मुनि-मन-मोहिनी मधुर वाणी से बोले- ??सूरदासजी! आपको बड़ी भूख लगी होगी। मैं कुछ मिठाई लाया हूँ, जल भी लाया हूँ, आप इसे ग्रहण कर लीजिए।?? बालक के उस मधुर स्वर ने श्री बिल्वमंगलजी को मोहित कर ही लिया था। उसके हाथ का दुर्लभ प्रसाद पाकर तो उनका हृदय हर्ष की हिलोरों से उछल उठा।

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