अनुक्रमणिका

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गुरुदेव की कृपा का फल


गुरुदेव की कृपा का फल

ये विश्व प्रशासन का नारा जो ये आज है, ये ज्ञानयुग की अनुभूति हो रही है। वो इसीलिये हो रही है कि ज्ञानवृक्ष-वेद की सत्ता अधिक गहराई से मानवीय चेतना में उतरी है और जैसे-जैसे ज्ञान गहराई में जाता है विश्व चेतना में वैसे-वैसे क्रियाशक्ति सारे विश्व को वैश्विक क्षेत्र में प्रभावित करके ऊपरी व्यवहार के क्षेत्र में उत्तमता लाते जाते हैं, लाते जाते हैं, लाते जाते हैं। ये अनुभूति की ज्ञान की गहराई में क्रियाशक्ति की सफलता है। ये अनुभूति की योगिक अर्न्तमुखता में सामाजिक समस्याओं का, राष्ट्रीय समस्याओं का हल है, ये दुर्लभ अनुभूति है। ....

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महर्षि जी का भारतीय ज्योतिष में योगदान


महर्षि जी का भारतीय ज्योतिष में योगदान

महर्षि जी ने भावातीत होने की तकनीक, भावातीत ध्यान प्रदान की जिससे विचार रूपी तरंग को, मन को शांत करके चेतन को एक ही समय पर बिंदु व अनंत रूप में अनुभव किया जा सकता है जिस प्रकार तरंग बैठने पर समुद्र की निस्सीमता अथवा पूर्णता का अनुभव करती है।....





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शिक्षा में क्या परिवर्तित करें,किसे परिवर्तित करें ?


शिक्षा में क्या परिवर्तित करें,किसे परिवर्तित करें ?

जिस समय देश की शिक्षा का समूचा सत्र नई सरकार के हाथ में आया था मौलाना अगर अपने प्रभाव का पूरा उपयोग कर जाते तो गाँधी, राजगुरु से ब्रम्हागुरु बन जाते और आज देश के पास भारतीय लायक कोई शिक्षा प्रणाली होती। दुर्भाग्य से मौलाना के समय में भी शिक्षा एक विभागीय व्यवस्था हो गई, जिसमे अधिकारी - ही अधिकारी हो गए, कर्मचारी - ही कर्मचारी हो गए। .....

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एक कदम सकारात्मकता की ओर


एक कदम सकारात्मकता की ओर

भारतीय संस्कृति विषय की एक विशिष्ट एवं अनुपम संस्कृति है। यह संस्कृति समिष्ट (सामूहिकता ) को विशेष महत्व देती है। इसलिए प्राथना में कहा जाता है "सहनाववतु सहनौभुनक्तु सहवीर्या करवाव है। " परिवार की सामूहिकता में ही हमारी भारतीय संस्कृति की जड़ें सुरक्षित हैं। परिवार की समूह भावना बंद मुट्ठी के सामान है। ......

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गुलामी से स्वतंत्र सिंध मेरा स्वपन


गुलामी से स्वतंत्र सिंध मेरा स्वपन

वीरू उन दिनों को याद करके कुछ भावुक हो जाती हैं। 'वह नरक भरा जीवन था। हम जी-तोड़ परिश्रम करते, पर हमारा ऋण बढ़ता ही जाता। कोई किसी के प्रति उत्तरदायी न था। मेरे बच्चों को कभी खाना मिलता और कभी वे भूखे सो जाते अनेक बार तो हम जंगलों में कुदरती रूप से उगी सब्जियां ढूंढ़कर लाते और उनको कच्चा खाकर ही अपना पेट भरते थे। '

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उर्जा से भर दे प्रातः के कुछ घंटे


उर्जा से भर दे प्रातः के कुछ घंटे

प्रातः शीघ्र उठना न मात्र आपकी दिनचर्या को सुचारु रखने में सहायता करता है बल्कि यह आदत आपके स्वास्थ को भी ठीक रखने में सहायक सिद्ध होती है। अगर आप अपने दिन, का प्रारंभ शीघ्र उठकर करते है तो न मात्र आप पूरे दिन ऊर्जा से भरे होते है।......

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श्रीकृष्णार्पणमस्तु शृंखला


श्रीकृष्णार्पणमस्तु शृंखला

कृष्ण का चरित्र भी निर्मल था। वासनात्मक शुचिता के प्रतीक थे, हमारा उद्देश्य कृष्ण की प्रचलित उन कथाओं से हटकर उनके पावन आचरण को प्रतिस्थापित करना है, जो कृष्ण की बाल लीलाओं के नाम पर बढ़ा - चढ़ा कर, चटकारे लेकर सुनाई गयी है अथवा गांव-खेड़ो में मंचों से सुनाई जाती है। कृष्ण कभी समझौता नहीं करते थे। अपने सिद्धांतो से , आचरण से और व्यवहार से। ......

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