अनुक्रमणिका
पृष्ठ क्र. 6
भावातीत ध्यान, मानव चेतना जागृति का वह स्तर, जो स्वयं को जानता है, प्रकृति के विधानों का आत्म-परक, आत्मसंवादी स्तर है जहां से प्रकृति के विधानों की पूर्ण सामर्थ्य, प्रकृति की संपूर्णता स्वयं ही गतिमान होती है। हम इसे प्रकृति विधानों की आत्मसंवादी गतिकी कहते हैं जहाँ प्राकृतिक विधान अपनी परिशुद्धता में है, प्राकृतिक विधान की मूर्त शुद्ध अवस्था है।...
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पृष्ठ क्र. 8
शिक्षा के उच्च संस्थानों ने भारतीय विचार-दृष्टि की गतिशीलता पर अपनी पकड़ खो दी है। इसका एक विशेष कारण है ज्ञान को समायोजित करने के लिए भारतीय भाषाओं को विकसित करने में विफलता। आज भी अंग्रेजी प्रामाणिक भाषा है और ज्ञान की दुनिया में उसी का वर्चस्व है। मन में हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं में सोचते हुए उन विचारों को अंग्रेजी में अनुवाद कर प्रस्तुत करना समयसाध्य ही नहीं, बहुधा निष्प्रभावी एवं अप्रामाणिक भी सिद्ध होता है।...
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पृष्ठ क्र. 10
हमारे द्वारा बोले गए शब्द की आत्मा है अर्थ। यह अर्थ हमारी सोच, कथनी और करनी के कारण शब्द में आता है और उसका सीधा प्रभाव सुनने वालों पर पड़ता है। यदि हम श्रद्धा या आस्था शब्द का उच्चारण करते हैं किंतु हमारा आचरण इसके बिल्कुल विपरीत है तो उसका प्रभाव नहीं पड़ेगा।...
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पृष्ठ क्र. 12
लक्ष्य बनाना सरल है, किंतु उन पर टिके रहना कठिन। हममें से अधिकतर लोगों का उत्साह कुछ ही दिनों में फीका पड़ जाता है। हम या तो बहुत कठिनाइयाँ देखकर निराश हो जाते हैं या बहुत सरल कार्य करके ऊब जाते हैं। यहीं पर काम आता है 'गोल्डीलॉक्स नियम'।...
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पृष्ठ क्र. 44
गर्मियों की छुट्टियों में बच्चों के पास समय बढ़ जाता है और माता पिता के सामने बड़ा प्रश्न खड़ा हो जाता है कि इन छुट्टियों को सार्थक कैसे बनाया जाए? कुछ का तो यह समय मोबाइल स्क्रीन, वीडियो गेम और टीवी तक सीमित होकर रह जाता है।
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