अनुक्रमणिका
पृष्ठ क्र. 6
विश्व चेतना में सत्व का स्तर बनने से और जैसे-जैसे वेद विज्ञान विद्यापीठ के विद्यार्थियों की संख्या बढ़ेगी वैसे-वैसे विश्व चेतना में प्रतिदिन प्रात:-सायं इनके संयम के अभ्यास से वो परत की परत सतोगुण की विश्व चेतना में बढ़ती जायेगी और वो दिन दूर नहीं है जब यहाँ की शिक्षा पद्धति में जो साधना का तत्व है, जो एक समन्वय तत्व है, जो एक वेद तत्व है।...
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पृष्ठ क्र. 8
हमारे देश में ये चौंकाने वाली विसंगतियाँ हैं, जिनसे हम शायद अनजान हैं। ये मात्र नीति और शासन की विफलता का परिणाम नहीं हो सकतीं। इनकी जड़ें हमारे दिलों में हैं, जहाँ मानवीय गुणों में सबसे बुनियादी है- सहानुभूति, जो शायद लुप्त हो गई लगती है। यह कमी सामूहिक रूप से हमारे समाज के संगठनों में दिखने लगी है।...
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पृष्ठ क्र. 10
आत्मसंयम अपनी चित्तवृत्तियों को वश में रखना है जिसके कारण व्यक्ति अपनी नकारात्मक वृत्तियों जैसे काम, लोभ, मोह आदि पर नियंत्रण रखता है। संयम और आत्मसंयम में जो सूक्ष्म अन्तर है वह इस प्रकार समझ सकते हैं संयम बाहरी परिस्थितियों एवं उत्तेजनाओं के प्रति होने वाली प्रतिक्रियाओं को रोकता है।...
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पृष्ठ क्र. 12
जिम्मेदारी से निर्णय लेने की तुलना में दूसरों को दोष देना, भाग्य के भरोसे रहना, हमें अधिक सरल लगता है। इस आदतवश हम स्वयं को शक्तिहीन और लाचार मानते चले जाते हैं, किंतु इससे हमारी समस्याएँ समाप्त नहीं हो जातीं। हम दूसरों की कृपा दृष्टि पर ही स्वयं को छोड़ देते हैं।
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पृष्ठ क्र. 42
पछड़ जाने या हर चीज़ में अपना नाम रोशन करने की चिंता अभिभावकों में संक्रामक बीमारी की तरह फैलती है। विज्ञापनों और होर्डिंग्स पर बच्चों के 98-99 प्रतिशत नंबरों के साथ फोटो लगाना और कोचिंग संस्थानों द्वारा उनका प्रचार करना, शिक्षा का सबसे भयावह रूप है
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