अनुक्रमणिका

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महर्षि सिद्ध निर्माण योजना


महर्षि सिद्ध निर्माण योजना

हम तप करेंगे , तप करने के मायने अपनी चेतना को बाहर इन्द्रियों अनुभवों से खींचकर भीतर लाओ। भावातीत का जो ध्यान है वही सारे तप का आदर्श रूप है। भावातीत ध्यान करते है तो तप हो जाता है। उससे क्या होता है ? चेतना शुद्ध हो जाती है। जब चेतना शुद्ध हो जाती है और जो त्रुटि होने वाली चेतना थी अब वो त्रुटि नहीं करेगी क्योंकि अब यह सहज हो गयी। तप करते है तो यह शास्त्र से हमको पानी चेतना का माप मिल जाता है और माप मिलना अत्यंत आवश्यक है।

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नई पाठ्यचर्या और चुनौतियां


नई पाठ्यचर्या और चुनौतियां

राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू करने के विभिन्न पक्षों पर देश में गहन चर्चा हो रही है। यह शिक्षा नीति एक विस्तृत विचार-विमर्श के बाद अस्तित्व में आई। इसका सबसे उत्साजनक पक्ष यह है कि देश ने इसे सकारात्मक दृष्टि से देखा है। शिक्षा नीतियों के क्रियान्वयन के सात दशकों के अनुभवों का भविष्य-संदर्भित विवेचन इस नीति निर्माण का आधार बना है। इसमें यह स्वीकार गया है कि रोजगार और कौशलों के बदलते परिप्रेक्ष्य में वही युवा अपना स्थान बना सकेगा, जिसने अपने प्रारंभिक अध्ययन काल में समस्या-समाधान का कौशल तार्किक व रचनात्मक रूप से सीखा हो। तार्किक और विश्लेषणात्मक मेधा का विकास तभी संभव होगा।...

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रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की और बढ़ते कदम


रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की और बढ़ते कदम

भारत अब रक्षा क्षेत्र में निर्यातक की बड़ी भूमिका में आ गया है। पिछले दिनों केन्द्र सरकार ने आर्टिलरी गन स्वदेशी, लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट, टैंकों और मिसाइलों, विस्फोटक, टैंक रोधी खानों और अन्य रक्षा उपकरणों के निर्यात के लिए अपनी अनुमति दे दी है। सरकार द्वारा कुल मिलाकर 156 रक्षा उपकरणों के निर्यात के लिए यह अनुमति दी गई है जिससे मैत्रीपूर्ण देशों को भारतीय हथियारों के निर्यात को बढ़ावा दिया जा सके।

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श्रीमद्भगवदगीता में प्रतिपादित शान्ति प्राप्त करने के उपाय


श्रीमद्भगवदगीता  में प्रतिपादित शान्ति प्राप्त करने के उपाय

शांति प्राप्त करने का उपाय ध्यान योग भी है। इसकी विवेचना श्रीमद्भगवतगीता के छठें अध्याय में की गई है। ध्यान योग में शरीर इन्द्रिय, मन और बुद्धि का संयम करना आवश्यक है। इन सबको आत्मा के नाम संज्ञा दी जाती है। इसीलिए ६ वें अध्याय का नाम 'आत्मसंयमयोग' रखा गया है। जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है , वह सन्यासी तथा योगी है केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योग नहीं है।....

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