अनुक्रमणिका

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समय की सीख


समय की सीख

हमारे विचार से तो समय जीवन की सबसे बड़ी सीख का स्मरण करा रहा है कि जीवन का कोई ठिकाना नहीं है। कब किस कारण से जाना पड़ जाये, पता नहीं। एक छोटा सा, अदृश्य कारण 200,000 व्यक्तियों का जीवन संक्षिप्त काल में ले गया और आगे कितनों को और समेट लेगा, यह किसी को पता नहीं है। विश्व के शीर्षस्थ वैज्ञानिक इसकी प्रकृति, संरचना, व्यवहार, प्रभाव और काट को लेकर अनुसंधान में रात-दिन एक किये हैं, चार माह हो चुके हैं लेकिन अंतिम परिणाम पर पहुँचना अभी भी संभव नहीं हुआ है।

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उनके लिए जो पहली, दूसरी नौकरी के बाद मुश्किल समय में हैं


उनके लिए जो पहली, दूसरी नौकरी के बाद मुश्किल समय में हैं

बदले हुए मैनेजमेंट के अनुसार अपने आपको बदलो। मैनेजमेंट कैसा भी हो, कॉफी के समान अच्छे स्वाद और सुगंध वाले वर्कर सबको चाहिए' अनुभूति ने माँ से वादा किया, वह दुनिया को बदलने के स्थान पर स्वयं को बदलेगी।...

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कौन-सा स्कूल भंग करना चाहते हैं इवान इलिच


कौन-सा स्कूल भंग करना चाहते हैं इवान इलिच

सीखना स्वयं में एक क्रिया है, ऐसा मान कर सीखना ही सही ढंग से सीखना है। रैमर एक खास किस्म के शिक्षण-परिदृश्य की भी कल्पना करता है। कक्षा में जब छात्र होता है तो उसकी भूमिका एक छात्र की भूमिका होती है और छात्र बनकर सीखना बड़ा कठिन होता है। सीखना तब ही अत्यंत स्वाभाविक ढंग से होता है जब कोई कार्य स्वयं किया जाता है या कोई खेल- खेला जाता है।...(निरंतर)

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lotus icon 6 पृष्ठ क्र. 12

योग के महायोगी


योग के महायोगी

योग के सभी महत्वपूर्ण अंगों का अभ्यास सजह ही जीवन के प्रत्येक स्तर पर पूर्णता प्राप्त कराता है। जाग्रत, स्वप्न, सुशुप्ति के अतिरिक्त चतुर्थ चेतना (भावातीत चेतना) एवं तुरियातीत चेतना, भगवत चेतना तथा ब्राह्मी चेतना का उत्तरोत्तर विकास कर योग ही सहज विधि भावातीत ध्यान व सिद्धि द्वारा प्रत्येक व्यक्ति 'अहं ब्रह्मास्मि' व 'खल्विदं ब्रह्म' का अनुभव कर सकता है।...

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निंदक नियरे राखिये


निंदक नियरे राखिये

अगर हम सकारात्मक सोच के साथ निन्दा और निन्दकों पर विचार करते हैं तो पहला लाभ तो यह होता है कि हमारा मन दुखी नहीं होता है, हमारी बुद्धि विचलित नहीं होती, हम शांत रहते हैं और हमारी कार्य क्षमता भी प्रभावित नहीं होती है। यही तो है जीने का सही अंदाज और स्वयं के व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बनाने का सबसे आसान उपाय।...

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बेगारी की पीड़ा और उपसभापति का गौरव


बेगारी की पीड़ा और उपसभापति का गौरव

कृष्णी की कठिनाईयों की सीमा इतनी बड़ी थी कि मानवता को उसमें अपनी लाज बचाने की कोई ओट न मिले। जब कभी मालिक के घर में कोई जलसा होता, आठ वर्ष की बच्ची चैन की सांस नहीं ले पाती। अनेक बार तो कार्य करते-करते इतनी देर हो जाती कि कृष्णी के लिए अपने घर लौटना भी संभव नहीं रह जाता।...

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lotus icon 6 पृष्ठ क्र. 42

श्रीकृष्णार्पणमस्तु शृंखला


श्रीकृष्णार्पणमस्तु शृंखला

कृष्ण के सानिध्य में जीवन था। उत्साह, उमंग, आशा और विश्वास। सकारात्मक सोच था उनका। निराश से निराश व्यक्ति भी उनके संपर्क में आते ही, नवजीवन के प्रति उन्मादित हो जाता था। कृष्ण जीवंतता के प्रवाह थे। ऊर्जा और आकर्षण। महाभारत के एक महत्वपूर्ण पात्र शिखंडी के माध्यम से हम आज कृष्ण के इस गुण को प्रत्यक्ष करने का प्रयास करेंगे।...

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