आवरण कथा

आध्यात्मिक वैश्वीकरण दीपावली पर्व

‘ हिन्दू धर्म में ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीन देव ही प्रधान है, जिनका संबंध उत्पत्ति, पोषण तथा संतुलन से जोड़ा जाता है। दीपावली के दिन इन तीनों देवों के परिवार का प्रतिनिधित्व रहता है। ब्रह्मा की मानस-पुत्री सरस्वती, विष्णु-पत्नी लक्ष्मी तथा महेश-पुत्र गणपति तीनों का एक साथ मिलकर पूजा करने का विधान है। इससे यह सिद्ध होता है कि समाज और उसके एक-एक व्यक्ति के लिए शुभ-लाभ. रिद्धि-सिद्धि सफलता, उन्नत्ति और मंगल कल्याण की कामना करने वाला यह पर्व जन-बल (गणेश ), धन-बल (लक्ष्मी ), बुद्धि-बल (सरस्वती), के सहयोग-समन्वय का प्रतीक है। जन, धन तथा बुद्धि इन तीनों के समन्वय से ही समाज का उत्थान हो सकता है। इसी तथ्य के प्रतीक के माध्यम से सुसज्जित करके मनीषियों ने एक-एक माटी के दीप को श्रंखलाबद्ध करके जीवन-पथ को आलोकित करने की दिशा निर्धारित की है। ’’

आध्यात्मिक वैश्वीकरण दीपावली पर्व

भारतीय चिन्तकों की दृष्टि प्रारम्भ से ही वसुधैव कुटुम्बकम् में विश्वास रखने वाली रही है, जिसमें भौतिक वैश्वीकरण के साथ-साथ आध्यात्मिक वैश्वीकरण की सोच को स्वीकार किया गया है। वर्तमान विश्व में भौतिक बाजारवादी संस्कृति का प्रसाद जिस प्रकार तीव्रता से हो रहा है, उससे प्रतिद्वंद्विता का घातक परिणाम भी सामने आ रहा है। हिंसा, हत्या, विनाश का ताण्डव देखकर ऐसा लगता है कि नैतिकता के स्थान पर अनैतिकता ही अधिक फैल रही है।
अनैतिकता के मापदण्ड भिन्न-भिन्न अवश्य हैं किन्तु उसकी व्याप्ति पतनोन्मुख होने से भविष्य के अँधेरों को निकट लाने वाली है। इस नकारात्मक दिशा को प्रिवर्तित करने की शक्ति मात्र आध्यात्म में है। इसे साधने के लिए भारत-भूमि पर समय-समय पर पर्व एवं त्योहारों को नैतिक चेतना का मुख्य सरोकार माना गया है। दीपावली त्योहार की बात करें तो दीपावली के समय द्वार के दाएँ-बाएँ गणेश-पुत्र शुभ-लाभ लिखने की परम्परा इसी दृष्टि से डाली गई। मात्र लाभ नहीं, लाभ शुभता पर टिका हो यही इसका मुख्य ध्येय रहा है। आज का भौतिकवादी वैश्वीकरण मात्र लाभ पर आधारित है। उसमें शुभता की भावना कहीं नहीं दिखाई देती। ऐसे में लक्ष्मी-पूजन का क्या अर्थ है? लक्ष्मी-पूजन करते समय हम शुभ-लाभ की चौघड़िया भी चुनते हैं। लक्ष्मी के साथ-साथ सरस्वती तथा गणेश के चित्र को भी आराधना स्थल पर रखते हैं।
यह इस बात का ही संकेत है कि लक्ष्मी अर्थात् धन के साथ-साथ बुद्धि की धवलता भी बनी रहे। अकेली लक्ष्मी का वाहन तो उलूक होता है किन्तु जब वह विष्णु के साथ विहार करती हैं तो गरुड पर सवार होती हैं। यह बात मैं इसलिए कहना चाहता हूँ कि इस प्रकार लक्ष्मी-पूजन करते समय नई पीढ़ी को ध्यान में आए कि दीपावली पर्व का सांस्कृतिक और सामाजिक पक्ष भी है, जिसे भुलाया नहीं जाना चाहिए। आने वाली पीढ़ी को यदि हम पाश्चात्य संस्कृति और समाज की अंधी-आँधी में धकेल देंगे तो चारों ओर अँधेरा-ही-अँधेरा छाएगा, फिर बाहर कितनी ही चकाचौंध हम करें, भीतर का अंधकार उससे प्रकाशित नहीं होगा। एक सज्जन इस बात को लेकर बहुत दु:खी थे कि त्यौहारों का आधुनिक स्वरूप भौतिकवादी अधिक हो रहा है। त्यौहारों में चली आई परम्पराएँ अब टूट रही हैं और उनके स्थान पर जिस मनोरंजन प्रधान संस्कृति का विकास हो रहा है, वह हमारी सांस्कृतिक धरोहर के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है। उन्होंने अपने पक्ष को प्रबलता से मेरे सम्मुख रखते हुए कहा कि भारत का सांस्कृतिक इतिहास पुस्तकों के पन्नों पर नहीं, अपितुु उसके प्राणवान उत्सवों, पर्वों तथा त्यौहारों में लिखा है।


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