आवरण कथा

भावातीत ध्यान

‘जीवन का लक्षण है चेतना की चंचलता और मुक्ति का लक्षण है चेतना की स्थिरता। इस दुहरी चेतनावस्था को ही विज्ञान में कास्मिक कान्शसनेस कहते है। यह चेतना का लघु स्वरु प भी है और बड़ा स्वरु प भी व्यष्टि रु प भी है और विराट रु प भी है। इसी अवस्था को हंसावस्था कहा गया है। इस प्रकार भावातीत ध्यान की शिक्षा का यह ज्ञान वैदिक सिद्धांतों में भरा पड़ा है। आधुनिक विज्ञान से इसकी पुष्टि करना होता है। इस सिद्धांत को कि सी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह तो अनन्त समय से चला आ रहा है। नित्य सिद्धांत है। अब तक इसका इतना गंभीर स्पष्टीकरण करने का अवसर भारत को मिला ही नहीं था। यह भारत की शिक्षा के गौरव का चित्रण है। परा और अपरा ज्ञान की शिक्षा का द्वार है जिसे हमें समझना है और समझकर अनुभव में लाना है। कहने का आशय यह है कि भावातीत ध्यान संभावनाओं का क्षेत्र है। ’’

भावातीत ध्यान

मानवीय चेतना एक अखंड, अनन्त और पूर्ण चेतना है। चेतना के प्रस्फुटन में पाश्चात्य विज्ञान और भारतीय ज्ञान एक दूसरे क ी प्रतिस्पर्धा करते हैं। प्राचीन अध्यात्म को स्वीकार नहीं करता और भारतीय चिंतन भौतिकता का विरोधी रहा है, दोनों की समानता को ध्यान में रखकर अभी तक कोई जीवनशैली विकसित नहीं हुई है।
आधुनिक विज्ञान अब इस खोज में जुटा है। महर्षि महेश योगी जी के प्रयास से भावातीत ध्यान के चिन्तन और व्यवहार दोनों ने यह सिद्ध कर दिया है कि नित्य शुद्ध चेतना जहाँ-जहाँ जाती है, वहीं दृष्टा का मन जाता है और जहाँ-जहाँ मन जाता है वह अपना प्रभाव छोड़ जाता है। ऐसा सुनते हुए एक बात याद आती है कि भारत में प्रात: उठने से पहले चारपाई से चरण रखते समय पृथ्वीमाता को प्रणाम करते हुए कहा जाता है- 'पृथ्वी त्वयाघृता लोकान्- हे पृथ्वीमाता तूने सारे लोक-लोकान्तरण को अपने ऊपर धारण किया हुआ है। देवि त्वं विष्णुना घृता- अर्थात् तुम्हें भगवान विष्णु ने धारण किया है किंतु इस प्रक्रिया के प्रभाव को अनुमान नहीं किया जाता है, इसलिए धीरे-धीरे परमात्मा से जुड़ने का भाव भी लुप्त होता जा रहा है।


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