आवरण कथा

डरना नहीं लड़ना होगा

‘सुनकर ही भयभीत कर देता है ना। कैंसर का रोग और उसका पीड़ा रोगी के साथ ही उससे जुड़े लोगों को भी तोड़कर रख देता है। इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता कि रोगी को किस अंग में कैंसर हुआ है और कैंसर किस स्तर तक संक्रमित हो गया है। कैंसर होने का पता प्राय: लोगों को बहुत देर से चल पाता है। कैंसर होने के बाद रोगी के जीवन में अनेक बड़े परिवर्तन होते हैं। उसे अपनी भविष्य के जवीन और बचे हुए दिनों पर भी आसक्ति होने लगती है।
ट्यूमर का नाम सुनते ही मस्तिष्क में कैंसर के संकट की जैसे घंटियां बजने लगती हैं। यह बात अलग है कि हर ट्यूमर कैंसर का संकेत नहीं होता। आवश्यकता इस बात की है कि हम ट्यूमर के उस रूप को पहचानें, जो संकट का संकेत हो सकता है। हमारा शरीर अरबों कोशिकाओं का जाल है। पुरानी कोशिकाओं के मृत होने और नई कोशिकाओं के बनने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। यदि किसी कारण से कोशिकाओं की इस सामान्य प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न हो जाए और इनकी वृद्धि असामान्य हो जाए, तो ये शरीर में गांठ के रूप में उभरने लगती हैं। इसी स्थिति को हम ट्यूमर कहते हैं। ट्यूमर असामान्य कोशिकाओं का समूह है। शरीर के किसी भाग की किसी कोशिका से इसकी प्रारंभ हो सकता है। चिकित्सकीय भाषा में इसे नियोप्लाज्म भी कहा जाता है। अर्थात ऊतकों का ऐसा जमाव, जो ठोस या द्रव से भरा हो सकता है। हो सकते हैं ये लक्षण: ट्यूमर कैंसरकारक हों या बिना कैंसर वाले, अगर उनका आकार बड़ा होता है, तो कुछ-न-कुछ लक्षण अवश्य उभरते हैं। भूख में कमी। भार कम होना। शीत आभास होना। थकान। पीड़ा होना। रात को पसीना आना। आक्रांत हिस्से में दबाव अनुभव करना। कुछ ट्यूमरों में त्वचा का रंग में परिवर्तन। ’’

डरना नहीं लड़ना होगा

मृत्युकारक रोग की श्रेणी मेंं प्रमुखता से सम्मिलित कैंसर पर अब एक सीमा तक नियंत्रण पाया जाने लगा है। इस सफलता की एक कारण इसके प्रति बढ़ी जागरूकता भी है। चार फरवरी को कैंसर दिवस हैं जिस अवसर पर कैंसर और इससे बचाव के बारे में जानते हैं। कैंसर के कारण से लोगों को अपनी जीवन में मानसिक, सामाजिक और आर्थिक कठिनाई झेलनी पड़ती है। यही कारण है कि अनुसंधानकर्ता लंबे समय से कैंसर को हराने की प्रयासों में जुटे हैं। कैंसर सर्जन और एंटी- टोबैको एक्टिविस्ट कहते हैं कि कैंसर के अधिकांश शिकार लोग 30 वर्ष की आयु के बाद के होते हैं। स्पष्ट है कि जीवनशैली में आए परिवर्तन के कारण 30 वर्ष की आयु के बाद आहार का प्रभाव हमारे शरीर पर दिखने लगता है। स्थिति यह है कि कैंसर की बढ़ती संख्या के कारण भारत विश्व में छठे स्थान पर पहुंच गया है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की रिपोर्ट के आधार पर विशेषज्ञों ने कहा कि भारत में प्रतिवर्ष लगभग आठ लाख कैंसर के नए मामलों की पहचान की जाती है, जिसमें अकेले सिर और गले के कैंसर के साढ़े पांच लाख मामले हैं।

क्या होता है कैंसर- चिकित्सालय के कैंसर रोग विशेषज्ञ कहते हैं कि शरीर के किसी भी भाग पर ऊतकों में असामान्य रूप से गांठ का उभरना कैंसर हो सकता है। इस रोग को अलग- अलग श्रेणी में रखा जा सकता है। ये श्रेणियां शरीर के भाग के अनुसार निर्भर करती हैं। कैंसर सामान्य रूप पर सेल्स में उत्पन्न होता है और टिश्यू तक फैल जाता है। कैंसर में अतिरिक्त बनने वाले सेल्स शरीर में टिश्यू का ढेर बना देते हैं और इस विकास को ट्यूमर कहते हैं। यह ट्यूमर कैंसर में परिवर्तित हो सकता है। यहां यह जानना भी आवश्यक है कि शरीर में उपस्थित सभी ट्यूमर कैंसर नहीं होते, बल्कि ट्यूमर कैंसर का रूप ले सकते हैं। प्राय: पर शरीर के किसी भी भाग पर ऊतकों में असामान्य रूप से गांठ बनना या उभार आना कैंसर हो सकता है। कोशिकाओं का असामान्य रूप से वृद्धि करना और अनियंत्रित रूप में विभाजित होना कैंसर होता है।

महिलाओं में बढ़ता कैंसर- भारत में सबसे अधिक महिलाएं कैंसर गर्भाशय कैंसर और गॉल ब्लैडर के कैंसर की शिकार होती हैं। विशेषकर उत्तर भारतीय महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर बहुत शीघ्रता से बढ़ रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि दिल्ली जैसे शहर की 70 प्रतिशत महिलाएं सर्वाइकल कैंसर के बारे में जागरूक नहीं है। मेट्रो शहरों में स्तन कैंसर और ओवरी के कैंसर के मामले भी निरंतर बढ़ रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं में जितने भी प्रकार के कैंसर होते हैं, उनमें डिबग्रंथि या ओवेरियन कैंसर आठवां सबसे आम कैंसर है। मृत्यु दर के मामले में इसका स्थाना पांचवा है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अनुसार शीघ्र मृत्यु होने का मुख्य कारण यह है कि अंतिम समय तक अनेक महिलाओं में इस रोग के लक्षण प्रकट ही नहीं होते।

पुरुषों में कैंसर- एक अनुमान के अनुसार पुरुषों में कैंसर से होने वाली मृत्यु में 31 प्रतिशत फेफड़े के कैंसर, 10 प्रतिशत प्रोस्टेट, आठ प्रतिशत कोलोरेक्टल, छह प्रतिशत पैंक्रिएटिंक और चार प्रतिशत लिवर कैंसर से होती हैं। इसलिए इसके प्रारंभिक लक्षणों को अनदेखा न करें। कैंसर के प्रारंभिक लक्षणों को अगर पहचान लिया जाये तो इस संकटकालीन स्थिति तक पहुंचने से रोका जा सकता है। प्रारंभिक अवस्था में पहचान होने के बाद इसके उपचार में सरलता भी होती है।


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