आवरण कथा

भारतीय लोक परम्परा और विज्ञान

‘भारतीय संस्कृति मे संस्कार और परम्पराओं का वैज्ञानिक महत्त्व है। जैसे हमारे बड़े प्रात: उठकर अपने दोनों हाथों को देखते हैं और उसमें ईश्वर का दर्शन करते हैं। धरती पर पैर रखने से पहले धरती माँ को प्रणाम करते हैं क्योंकि जो धरती माँ धन-धान्य से परिपूर्ण करती है, हमारा पालनपोषण करती है, उसी पर हम पैर रखते हैं। इसीलिए धरती पर पैर रखने से पहले उसे प्रणाम कर उससे क्षमा मांगते हैं। अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में ऐसा प्रसंग है। सूर्य ग्रहण के समय घर से बाहर न निकलने की परंपरा के पीछे वैज्ञानिक तथ्य छिपा हुआ है। सूर्य ग्रहण के समय सूर्य से बहुत ही हानिकारक किरणें निकलती हैं जो हमें हानि पहुंचाती हैं। इसी प्रकार कहा जाता है कि हमें सूर्योदय से पहले उठना चाहिए क्योंकि इस समय सूरज की किरणों में भरपूर विटामिन डी होता है और ब्रह्म् मुहूर्त में उठने से हममें स्फूर्ति रहती हैं और आलस्य हमारे पास भी नहीं भटकता। हमारे वेद पुराणों में प्रकृति को माता और इसके प्रत्येक रूप को देवी- देवताओं का रूप दिया गया है। हमने कुछ पेड़ों को जैसे-बरगद, पीपल को देवताओं और तुलसी, नदियों को देवी का रूप दिया है। यह कोई अन्धविश्वास नहीं है इसके पीछे बहुत बड़ा तथ्य छुपा हुआ है। हमारे पूर्वजों ने इन्हें देवी- देवताओं का दर्जा इसलिए दिया क्योंकि कोई व्यक्ति किसी की पूजा करता है तो वह कभी भी उसको नुकसान नहीं पहुंचा सकता। घर में पूजा पाठ करते समय धूप, अगरवत्ती, ज्योति जलाते हैं तथा शंख बजाते हैं इन सबके पीछे वैज्ञानिक तथ्य छुपा हुआ है।’’

भारतीय लोक परम्परा और विज्ञान

'परम्परा समाज की एक सामूहिक विरासत है जो कि सामाजिक संगठन के सभी स्तरों में व्याप्त होती है, उदाहरण के लिए मूल्य- व्यवस्था सामाजिक संरचना और व्यक्तित्व की संरचना। इस प्रकार परम्परा सामाजिक विरासत को कहा जाता है इस सामाजिक विरासत के तीन तत्व हैं- मूल्यों की व्यवस्था, सामाजिक संरचना और उसके परिणामस्वरूप व्यक्तित्व की संरचना।' यह परम्परा का समाजशास्त्रीय अर्थ है। इसके अतिरिक्त भी परम्परा को अनेक अर्थ दिए गए हैं जैसे- अर्थ यात्मशास्त्रीय अर्थ अथवा ऐतिहासिक अर्थ। परम्परा का समाजशास्त्रीय अर्थ सामाजिक सांस्कृतिक और कार्यात्मक होता है।

अध्यात्मशास्त्रीय अथवा दार्शनिक दृष्टि से परम्परा से तात्पर्य उन सत्यों से है जो अति प्राचीन काल में अभिव्यक्त हुए थे और जो शाश्वत सत्य हैं। इन सत्यों में आध्यात्मिक एकता पाई जाती है। ऐतिहासिक दृष्टि से प्रत्येक परम्परा उद्विकास के बाद पतन की सीढ़ी पर पहुँचती है। परम्परा आध्यात्मिक शक्तियों में निहित होती है जो कि मानव शक्तियों से परे होती हैं, इसलिए उसका विकास भी दैवी भारत में परम्परा और आधुनिकता की समस्या को समझने से पहले यह जानना आवश्यक है कि आधुनिकता क्या है। आधुनिकता की धारणा पश्चिमी देशों की आधुनिक प्रगति विशेषतया संयुक्त राज्य अमरीका अथवा ब्रिटेन की सामाजिक संरचना के नमूने के आधार पर बनाई-गई है।

परम्परा का ऐतिहासिक अर्थ ऐतिहासिक दर्शन पर आधारित है। इसमें यथा सम्भव अनुभवात्मक और वस्तुगत दृष्टिकोण ग्रहण करने का प्रयास किया जाता है। परम्परा के अध्यात्मशास्त्रीय और ऐतिहासिक दोनों ही अर्थ समाजशास्त्र की दृष्टि से उपयुक्त नहीं है। समाजशास्त्र में परम्परा का सामाजिक सांस्कृतिक अथवा कार्यात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाता है परम्परा यह अर्थ अपेक्षाकृत आधुनिक काल में विकसित हुआ है। किसी भी समाज में संस्कृति में समान विकास होता रहता है, फिर भी कुछ मूल्य, संस्थाएँ और सामाजिक संरचना के कुछ अंग न्यूनाधिक रूप से स्थायी बने रहे हैं। इन्हें ही परम्परा कहा जा सकता है। परम्परा का यह प्रत्यय भारतवर्ष में परम्परागत संस्कृति के विवेचन से और भी अधिक स्पष्ट होगा।


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