आवरण कथा

भारत के सपूतों तुमने कर दिया कमाल

‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजनीति में आते ही कश्मीर को भारत का सही मायनों में अभिन्न अंग बनाने का सपना देखा था। यही वजह है कि उन्होंने 370 का विरोध करते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी के साथ एकता यात्रा की और 1992 में लाल चौंक पर झंडा फहराया। एनडीए 2 के आते ही अपने करीबी अमित शाह को गृहमंत्री बनाया और पूरी तरह से कश्मीर पर सक्रिय कर दिया। परिणाम सामने है। पुलवामा के लेथपोरा में हुए हमले के बाद मोदी ने साफ कहा था कि बलिदान बेकार नहीं जाएगा।

धमकी, जिहाद के नारों से, हथियारों से कश्मीर कभी हथिया लोगे यह मत समझो हमलों से, अत्याचारों से, संहारों से भारत का शीष झुका लोगे यह मत समझो। जब तक गंगा मे धार, सिंधु में ज्वार, अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष, स्वातंत्र्य समर की वेदी पर अर्पित होंगे अगणित जीवन यौवन अशेष। अमेरिका क्या संसार भले ही हो विरुद्ध, काश्मीर पर भारत का सर नहीं झुकेगा एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते, पर स्वतंत्र भारत का निश्चय नहीं रुकेगा।
स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी
( पूर्व प्रधानमंत्री ) ’’

भारत के सपूतों तुमने कर दिया कमाल

1949 में जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देकर उसे एक तरह से भारत के संवैधानिक उपबंधों से अलग कर दिया गया। 1954 में अनुच्छेद 35ए से जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता को और मजबूत कर दिया गया। देश की आजादी की चाह में जिन राष्ट्र भक्तों ने हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दी, उनके अखंड भारत के सपनों को जम्मू-कश्मीर के यह विशेष प्रावधान मुंह चिढ़ाते रहे हैं। ये विशेष प्रावधान देश की अखंडता की राह में बड़ी बाधा साबित हो रहे थे। देश का मानचित्र में यह उसकी सीमारेखा के भीरत भले ही दिखता रहा हो, किंतु आंतरिक नियम-कानूनों को लेकर शेष भारत से यह कटा रहा। कुछ खास मामलों को छोड़कर जम्मू-कश्मीर के लिए केंद्र सरकार कोई कानून नहीं लागू कर सकती थी। कोई वहां जमीन नहीं खरीद सकता था। निवेश के नाम पर कोई उद्योग वहां नहीं लगाया जा सकता था... आदि आदि इत्यादि। ये समस्त उपबंधों को बनाए रखने को लेकर अनेक स्थानीय राजनीतिक दल दबाव बनाने में जुटे थे। इनकी राजनीतिक विरासत ही इन्हीं मसलों पर टिकी रही। अब जब केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर को लेकर इस ऐतिहासिक भूल को सुधारने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है तो सही मायने में स्वतंत्रता के मलवालों और शहीदों के अखंड भारत का सपना साकार हुआ है। आइए इस ऐतिहासिक भूल की पृष्ठभूमि पर डालते हैं एक नजर:

अनुच्छेद 370 का विशेष प्रावधान-बात आजादी के दो वर्ष बाद अर्थात 1949 की है। अक्टूबर का महीना था। 17 तरीख थी। इसी दिन संविधान में इस अनुच्छेद को जोड़कर जम्मू- कश्मीर राज्य को भारतीय संवैधानिक प्रावधानों से अलग (अनुच्छेद एक और खुद-अनुच्छेद 370 को छोड़कर) कर दिया गया। इस अनुच्छेद के अनुसार यह राज्य अपना संविधान स्वयं तैयार कर सकता था। यह अनुच्छेद संसद की विधायी शक्तियों को जम्मू-कश्मीर पर लागू होने से रोकता है। राज्य के भारत में विलय संबंधी दस्तावेज (इंस्टूमेंट ऑफ एक्सेसन) में जो हिदायतें दी गई हैं उसके अनुसार उसमें वर्णित मामलों पर केंद्रीय कानून बनाने के लिए भी राज्य से सलाह-मशविरा करना होगा। इसके इतर अन्य मामलों पर केंद्रीय कानून बनाने के लिए राज्य की अनुमति लेनी अनिवार्य है।

भारत में विलय संबंधी दस्तावेज-भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के लिए भारतीय कानून, 1947 लागू हुआ। इस कनून में 600 रियासतों की संप्रभुता को बरकरार रखते हुए उन्हें तीन विकल्प दिए गए थे। पहला, वे स्वतंत्र देश के रूप में अपना अस्तित्व बरकरार रख सकते थे। वे भारत में पहले दिन से ही जम्मु-कश्मीर को लेकर सक्रिय। ताबड़तोड़ बैठकें और निर्णय। ईडी, सीबीआई, एनआइए की घाटी में कार्रवाई तेज। पाकिस्तान के साथ हर तरह से सीमापार व्यापार बंद किया। अलगाववादियों की कमर तोड़ी। कई एनजीओ बंद करा विदेशी फंडिंग रोकी। आतंककारियों को इतना हतोत्साहित किया कि शाह के श्रीनगर पहुंचने पर बाजार तक बंद नहीं करा सके। इससे पहले अलगाववादी श्रीनगर क्या कश्मीर ही बंद करा देते थे। राज्यसभा में इस घोषणा से पहले जब रिपोर्टर ने अमित शाह से पूछा तो उन्होंने कहा कि अब मुस्कराइए।


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