आवरण कथा

वसंत आनंद का उत्सव

‘ वसंत ऋतु का आगमन होता है। यह ऋतु बड़ी मस्त.. बड़ी मनभावन होती है। शीत काल में प्रकृति का वो सबकुछ जो कड़क ठंड से नष्ट अथवा सुशुप्त अवस्था में हो गया था वो पुन: नवीन रूप से हर बार से और सुन्दर शक्तिवान और स्फूर्तिमय हो चारों दिशाओं के वातावरण को आच्छादित कर देता है। अर्थात हमारे चारों ओर प्रकृति में खुला आकाश और वृक्ष, पेड़-पौधे, लताएँ, वन-उपवन ही दृश्यमान होतें हैं। खिली-खिली धूप, बेल-लताओं में नए- नए पत्ते, कोंपलें, मंजरियाँ तथा रंग-बिरंगे सुगंधित फूलों के गुच्छे से सजे पेड़-पौधे साथ ही स्वादिष्ट फलों से लदी वृक्षों की डालियाँ, कलरव करते पक्षी गण। आनंद की बहार किस को नहीं आनंदित कर देती है? सभी लोग इस वसंत ऋतु में प्रसन्नचित्त स्वत: हो जातें हैं। यह सभी को प्रसन्न करने का ''प्रकृति का अनमोल उपहार'' ही समझना चाहिए। वैसे सभी मौसम, ऋतुएं अपनी-अपनी विशेषता लिए होती हैं। मधुमास का सौंदर्य इसको अपने आप में विशेष होने के कारण इसे सर्वोपरि बना देती है। हमारे भारतीय शास्त्रीय संगीत में इस मौसम के अनेक 'राग' और अनेक गीतों का भण्डार है। एक राग तो 'राग-बसंत' के नाम से ही जाना जाता है। इस पर्व और मधुमास के बारे में हमारे अनेक कवियों ने रचनाकारों ने अनेक उल्लेखनीय वर्णन किया है। ’’

वसंत आनंद का उत्सव

विद्या की देवी सरस्वती का जन्मदिवस वसंत पंचमी, वसंत ऋतु के आगमन का भी प्रतीक है। यह पर्व भारत के साथ-साथ पश्चिमोत्तर बांग्लादेश और नेपाल में भी धूमधाम से मनाया जाता है साथ ही विश्वभर में जहां भी भारतीय बसे हैं, इस पर्व को पूरे विधि-विधान से मनाते हैं। यह पर्व माँ शारदे की उपासना और उनकी असीम अनुकम्पा अर्जित करने का भी अवसर है। कहा जाता है कि इस दिन पीले वस्त्र धारण करने चाहिए। इस पर्व के महत्व का वर्णन पुराणों और अनेक धार्मिक ग्रंथों में विस्तारपूर्वक किया गया है। विशेष रूप से देवी भागवत में उल्लेख मिलता है कि माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही संगीत, काव्य, कला, शिल्प, रस, छंद, शब्द शक्ति जिह्वा को प्राप्त हुई थी।
पूजन विधि- दिन देश भर में शिक्षाविद् और छात्र माँ शारदे की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान बनाने की प्रार्थना करते हैं। वसंत पंचमी के दिन विद्यालयों में भी देवी सरस्वती की आराधना की जाती है। भारत के पूर्वी प्रांतों में तो इस दिन घरों में देवी सरस्वती की मूर्ति स्थापित कर उनकी पूजा की जाती है। अगले दिन मूर्ति को नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। वसंत पंचमी पर पीले वस्त्र पहनने, हल्दी से सरस्वती की पूजा और हल्दी का ही तिलक लगाने का भी विधान है।
वसंत पंचमी पर पीले रंग का क्या है महत्व?- पीला रंग इस बात का द्योतक है कि फसलें पकने वाली हैं। इसके अतिरिक्त पीला रंग समृद्धि का सूचक भी कहा गया है। इस पर्व के साथ प्रारंभ होने वाली वसंत ऋतु के समय फूलों पर बहार आ जाती है, खेतों में सरसों सोने के समान चमकने लगती है, जौ और गेहूं की बालियां खिल उठती हैं और इधर-उधर रंगबिरंगी तितलियां उड़ती दिखने लगती हैं।
पर्व का पौराणिक महत्व- हिन्दू संवत के अनुसार प्रत्येक वर्ष माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाए जाने वाले इस त्योहार के दिन ही ब्रह्माण्ड के रचयिता ब्रह्माजी ने सरस्वती की रचना की थी। जिसके बारे में पुराणों में यह उल्लेख मिलता है कि सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्माजी ने मनुष्य योनि की रचना की पर अपने प्रारंभिक अवस्था में मनुष्य मूक था और धरती बिल्कुल शांत थी। ब्रह्माजी ने जब धरती को मूक और नीरस देखा तो अपने कमंडल से जल लेकर छिड़का जिससे एक अद्भुत शक्ति के रूप में चतुर्भुजी सुंदर स्त्री प्रकट हुई जिनके एक हाथ में वीणा एवं दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। यह शक्ति सरस्वती कहलाई। उनके द्वारा वीणा का तार छेड़ते ही तीनों लोकों में कंपन हो गया और सबको शब्द और वाणी मिल गई।


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