आवरण कथा

गुरु तत्व की विवेचना

‘व्यक्तित्व का व्यक्तिपरक पहलू अनुभव और कार्मिक प्रक्रिया से संबंधित है। परन्तु इस सबके परे भी कुछ है अनुभवातीत और कर्मातीत। यही है जीवनसत्ता यह अनभिव्यक्त है जो प्रज्ञा के रूप में अभिव्यक्त भी है। जीवन के इसी स्वरूप के मूल तक पहुंचने के लिये महर्षि जी ने ध्यानाधारित भावातीत ध्यान पद्दति पर बल दिया। उन्हें निकट से जानने वाले उनके गुरुत्व को लेकर उसका त्रिआयामी वर्गीकरण करते हैं। उन्हें जानने वाले उन्हें विश्वगुरु मानते हैं। किन्तु इस जानने में एक शर्त है: सुइ जानहि जेहि देहु जनाई। कुछ लोगों ने महर्षि- प्रतिपादित भावातीत ध्यान पद्दति को सुनकर अपनाया है। वे उन्हें चन्दन गुरु कहते हैं जिसकी वैचारिक सुगन्ध हमें एक अनिर्वचनीय गंध से गंधायित कर देती है। मगर कुछ लोग (साधक) अधिक भाग्यवान थे जिन्हें महर्षि जी को स्पर्श करने का दैवीय सुअवसर मिला। वे उन्हें पारस गुरु मानते हैं।’’

गुरु तत्व  की विवेचना

गुरू अनन्त अखण्ड प्रकृति का एक सनातन तत्व है एवं गुरू देव उस सनातन भागवत तत्व का भौतिक अवतरण है। गुरू इस धरा पर एवं उससे परे भी पूर्ण जीवन प्रवाह है। देवनागरी में गुरू का एक नाम 'जीव' भी है अर्थात् गुरू वास्तव में जीवन ही है। गुरू रचियता (ब्रह्मा), पालनकर्ता (विष्णु) व शांति एवं सामंजस्यकर्ता (शिव) है साथ ही वह केवल देवस्वरूप ब्रह्मा महेश ही नहीं वरन् परम ब्रह्म स्वरूप साक्षात पूर्ण ज्ञान, वेद, वेदांग, मूर्ति का वास्तविक स्वरूप है। गुरू पूर्ण ज्ञान सर्वोच्च ज्ञान का उदभव करते हैं गुरू आत्मा का, स्व का अनुभव कराता है एवं न केवल सर्वोच्च विद्या, आध्यात्मिक विद्या (अध्यात्म विद्या विद्यानाम) वरन साथ ही आधिवैदिक व आधिभौतिक विद्या भी प्रदान करते हैं।

गुरू व्यक्त व अव्यक्त का पूर्ण ज्ञान व अनुभव प्रदान करता है। देवता तो भौतिक रूप से दिखलायी नहीं पड़ते परन्तु गुरू सशरीर व्यक्त रूप में अव्यक्त का पूर्ण ज्ञान व अनुभव कराते हैं। रूप के द्वारा रहित का दर्शन कराते हैं, गुरू वेद व वेदान्त दोनों का स्वरूप होते हैं। श्री गुरू के चरणकमल बिन्दु रूप में प्रकृति के सतानत तत्व का, उसकी अनन्त सम्पूर्णता व विस्तार सहित प्रतिनिधित्व करते हैं जिससे प्रत्येक शरणागत उसे सहज ही उसकी पूर्णता में प्राप्त करता है। व्यक्त ब्रह्माण्ड, सृष्टि में गुरू तत्व, गुरू ग्रह के रूप में गुरू तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। वेदांग ज्योतिष में गुरू सर्वाधिक शुभ ग्रह माना जाता है, गुरू व्यक्ति को माया के बन्धनों से मुक्त करते हैं और वह बन्धनों को भी मुक्ति का साधन बनाकर जिससे व्यक्ति सीमााओं में भी निस्सीमता का अनुभव करते हैं। गुरू व्यक्ति के जीवन से सभी अशुभ प्रभावों को समाप्त करते हैं।

इसी कारण उसे ग्रहपीड़ापहारक भी कहा जाता है अर्थात् गुरू कृपा से ग्रहों दुष्प्रभाव प्रभावहीन हो जाते हैं। समय-समय पर प्रकृति के नियमानुसार आचरण न करने से विविध अशांति, रोग, अफलता आदि से त्रस्त मानव जाति को पुन: प्रकृति पोषित प्रकृति के नियमानुसार कर्तव्य की शिक्षा देकर सन्मार्ग पर लाने हेतु ही प्रकृति प्रेरणा से गुरू का धरा पर अवतरण होता है, क्योंकि प्रकृति अधिक समय तक मनुष्य को अशांत व दुखी नहीं रखना चाहती।


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