आवरण कथा

स्वस्थ्य शरीर में स्वस्थ्य मन

‘ अनन्त श्रीविभूषित ज्योतिष्पीठोद्धारक एक परम तपस्वी, ज्ञानी और वेदान्ती, सर्वसमर्थ चेतना के प्रत्यक्ष प्रमाण, साधक, जगद्गुरु शंकराचार्य ज्योतिष्पीठोद्धारक स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज के परम प्रिय शिष्य परम पूज्य महर्षि महेश योगी जी हुए। महर्षि जी को जितनी भी संज्ञाओं या उपमाओं से सुशोभित किया जाये वह कम है। बाल ब्रह्मचारी, परम योगी, विश्व प्रशासक, युग पुरुष, ऐतिहासिक पुरुष, चेतना वैज्ञानिक, वेदमूर्ति, ज्ञानमूर्ति, संत, महात्मा, महर्षि, ब्रह्मर्षि, राजर्षि, एक वास्तविक जगद्गुरु आदि संज्ञायें यदि किसी एक महापुरुष के लिये कम पड़ती हों तो वो महर्षि महेश योगी हैं। जब हम अपने गुरु के लिए ब्रह्मा, विष्णु, महेश और परमब्रह्म की उपाधियुक्त स्तुति करते हैं तो किंचित त्रिदेवों का भाव जागृत होता है, किन्तु उन भक्ति के क्षणों में देवों के गुणों अथवा उनके कार्यों की व्याख्या नहीं हो पाती। महर्षि जी ने कभी भी न स्वयं को गुरु कहा और न किसी से अपने को गुरु कहलवाया। सारा जीवन अपने परमाराध्य गुरुदेव अनन्त श्रीविभूषित जगद्गुरु शंकराचार्य ज्योतिष्पीठोद्धारक स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी के श्रीचरणों का स्मरण, उनका पूजन और सारे विश्व में जय गुरुदेव का उद्घोष कर उनकी जय-जयकार करते रहे और करवाते रहे। सारे विश्व ने महर्षि जी को न मात्र एक विशिष्ट शिक्षक या गुरु का स्थान दिया बल्कि वे वास्तविक ऐतिहासिक जगद्गुरु हुए और वैदिक गुरु परम्परा में अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान बना गये। भारत ही नहीं, विश्व के अनेक राष्ट्रों में गुरुजनों का विशेष सम्मानजनक और पूज्यनीय स्थान रहा है। ’’

स्वस्थ्य शरीर में स्वस्थ्य मन

वर्ष 2023 अति महत्त्वपूर्ण है। यह परम पूज्य महर्षि महेश योगी जी के जन्म का 106वां वर्ष है। इस वर्ष महर्षि जी के सभी भारतीय संस्थानों ने मिलकर निश्चय किया है कि इस वर्ष को एक महोत्सव के रूप में मनायेंगे और महर्षि जी द्वारा प्रदत्त ज्ञान व तकनीकों को वृहद स्तर तक मानवता के हित में जन-जन तक पहुँचायेंगे। यह महोत्सव इस वर्ष प्रारम्भ तो होगा किन्तु समाप्त कभी नहीं होगा, अनवरत चलता रहेगा, क्योंकि इस उत्सव के अन्तर्गत आयोजित कार्यक्रम आगे आने वाले समय और समस्त पीढ़ियों के लिये लाभ प्रदायक और जीवनोत्थान के लिये परमावश्यक है। इस उत्सव के कुछ प्रमुख कार्यक्रम और योजनायें इस प्रकार हैं:
1. भारतवर्ष की सामूहिक चेतना में सतोगुण की वृद्धि के लिये भारत की जनसंख्या के एक प्रतिशत के वर्गमूल बराबर, अर्थात लगभग 3500 भावातीत ध्यान, सिद्धि कार्यक्रम और योगिक उड़ान भरने वाले साधकों के अनेक स्थायी समूह बनाना।
2. प्रत्येक प्रान्त और नगर की जनसंख्या के एक प्रतिशत के वर्गमूल के बराबर संख्या में भावातीत ध्यान, सिद्धि कार्यक्रम तथा योगिक उड़ान भरने वालों के स्थायी समूह बनाना।
3. प्रत्येक नगर में प्राथमिक कक्षाओं से लेकर उच्च शिक्षा तक की आदर्श शिक्षा व्यवस्था करना जिसमें आत्मा आधारित शिक्षा, वेद विज्ञान पर आधारित शिक्षा, चेतना पर आधारित शिक्षा सम्मिलित हैं।
4. प्रत्येक नगर व विकासखण्ड में महर्षि वेद विज्ञान भवन की स्थापना करना जिसमें अष्टांग योग, भावातीत ध्यान, सिद्धि कार्यक्रम, योगिक उड़ान और वेद विज्ञान के समस्त जीवनोपयोगी विषयों का ज्ञान उपलब्ध कराना।
5. 48 ब्रह्मनन्द सरस्वती नगरों की स्थापना करना जहाँ 1500 वैदिक याज्ञिक नित्य प्रमुखत: एक अतिरुद्राभिषेक और अन्य यज्ञानुष्ठानों का संपादन विश्व परिवार के समस्त सदस्यों के सुख, शांति, सम्पन्नता, समृद्धि, स्वास्थ्य, सुरक्षा, प्रबुद्धता और अजेयता के संकल्प के साथ करेंगे। प्रत्येक ब्रह्मनन्द सरस्वती नगर से चार देश जुड़े होंगे जो इन नगरों का वित्तीय पोषण करेंगे और वैदिक विद्वान इन देशों के कल्याण के लिये यज्ञानुष्ठान संपादित करेंगे। इन ब्रह्मानन्द सरस्वती नगरों में चारों आश्रमों-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम का प्रशिक्षण और आवास होगा।


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