संपादकीय

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ब्रह्मचारी गिरीश
संरक्षक संपादक

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भौतिकवादी और अध्यात्मवादी में एक ही अंतर है- अध्यात्मवादी प्रतिदिन अपने में कुछ नवीन करने की चिंता में संलग्न है, क्योंकि उसका कहना यह है कि यदि मैं नया हो गया तो इस जगत में मेरे लिए कुछ भी पुराना न रह जाएगा, क्योंकि जब मैं ही नवीन हो गया तो पुराने का स्मरण करने वाला भी न बचा, पुराने को देखने वाला भी न बचा। सब कुछ नवीन हो जाएगा। और भौतिकवादी कहता है कि चीजें नवीन करो, क्योंकि स्वयं के नवीन होने का तो कोई उपाय नहीं है। नवीन मकान बनाओ, नवीन सड़कें लाओ, नवीन कारखाने, नवीन व्यवस्था करो। सब नवीन कर लो।


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प्रतिस्पर्धा स्वयं से

किसी प्रतियोगिता या परीक्षा में विजय या पराजय अधिक अर्थ नहीं रखते। दोनों ही स्थितियां आपको वास्तविकता से दूर ले जाती हैं। अगर आप किसी परीक्षा में अच्छे अंक आने या सफल होने से अहंकारी हो जाते हैं तो ऐसी सफलता आपके लिए किसी कार्य की नहीं। इसी प्रकार अगर किसी प्रतियोगिता या परीक्षा में विफल होने पर आप निराश हो जाते हैं तो भी वह प्रतियोगिता आपके लिए व्यर्थ है। प्रतियोगिताएं मनुष्य के लिए बड़ी प्रेरणा का स्रोत होती हैं। ये आपको लक्ष्य तक पहुंचाती हैं। इन प्रतियोगिताओं में सदैव आपकी प्रतिस्पर्धा आपके सहपाठियों या भाई-बहनों से होता है। यह स्पर्धा गलत मोड़ तब ले लेता है, जब आपका उद्देश्य दूसरे को पराजित करना बन जाता है। प्रतियोगिता और तुलना किसी भी विद्यार्थी के जीवन का अभिन्न भाग हैं किंतु इनका उसके जीवन पर सकारात्मक प्रभाव ही पड़ना चाहिए। उसे प्रतियोगिता को स्वयं के आगे बढ़ने की एक सीढ़ी के रूप में देखना चाहिए न कि किसी और के बढ़ने को अपने मार्ग की रुकावट के रूप में।
सबसे पहले स्वयं को जानें : प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक क्षेत्र में उत्कृष्ट नहीं हो सकता है। इस बात को शीघ्र अतिशीघ्र स्वीकार कर लेना चाहिए। अपनी गुणों को जानें और उन्हें सशक्त करें। इसी प्रकार अपनी कमियों को भी जानें और उन्हें दूर करने का प्रयास करें। प्राय: यह देखा गया है कि एक व्यक्ति की कमजोरियाँ बाद में उसका सबसे बड़ा हथियार बन जाती हैं।
अपने लिए नए लक्ष्य निर्धारित करें : दूसरों के परिणामों से स्वयं का मूल्यांकन नहीं करें। आप अपने लिए नए-नए लक्ष्य बनाएं और उन्हें पूरा करें। आपका स्पर्धा स्वयं से होना चाहिए जिसमें आप अपने पिछले कल से अपने आने वाले कल का सामना करें और प्रत्येक आने वाले कल को पिछले कल से श्रेष्ठ बनने के लिए प्रयास करें।
परिश्रम पर अधिक ध्यान दें : जब आप स्वयं तुलना दूसरों से करते हैं, तब आप उनके परिणाम पर ध्यान देते हैं। ऐसा करने के स्थान पर आप अपने परिश्रम पर विश्वास करें और अपने कमजोर पक्ष को मजबूत करने में जुट जाएं। परिश्रम का कोई विकल्प नहीं होता है और जीवन में सफलता पाने के लिए इससे बचने का कोई उपाय होता ही नहीं है।
किसी कि सोच की चिंता न करें : प्राय: हम दूसरों के कहने और सोचने की बहुत अधिक चिंता करते हैं। दूसरों के कहने पर न जाएं और न ही उससे व्याकुल हों। स्वयं की क्षमताओं को पहचानें और पूरी लगन से अपने उद्देश्य की प्राप्ति में लग जाएं। दोस्तों द्वारा समझाई गर्इंचीजें सरलता से समझ आ जाती हैं, इसलिए स्वयं को न समझ आने वाली चीजों को अपने मित्रों से समझें। मित्रों के अच्छी स्वभाव से भी सीख लें।इसके लिए आपके पास श्रेष्ठ मित्र होने आवश्यक हैं।
अन्य लोगों की सफलता पर प्रसन्न हों : दूसरों की सफलता से उदास या निराश न हों, किन्तु इसे उनकी कड़ी परिश्रम का परिणाम समझ सीख लें और प्रसन्नता प्रकट करें। इससे आपके अंदर निराशा का भाव नहीं रहेगा और आप श्रेष्ठ कार्य करने के लिए प्रेरित होंगे।
प्रत्येक नया दिन अगले ही दिन पुराना हो जाता है। किंतु आप किसी क्षण को नया करने के नियम जान जाएं, तो फिर प्रत्येक क्षण नया हो जाएगा। यह तभी होगा, जब आप चीजों के स्थान स्वयं को नया करने का प्रयास करें। स्वयं को नवीन करने का मार्ग अध्यात्म बताता है, भौतिकता नहीं। संसार में दो ही प्रकार के लोग हैं- एक वे जो अपने को पुराना बनाए रखते हैं और चीजों को नया करने में लगे रहते हैं। जिसको भौतिकवादी कहना चाहिए, यह वह आदमी है, जो चीजों को नए करने की खोज में है। भौतिकवादी और अध्यात्मवादी में एक ही अंतर है- अध्यात्मवादी प्रतिदिन अपने में कुछ नवीन करने की चिंता में संलग्न है, क्योंकि उसका कहना यह है कि यदि मैं नया हो गया तो इस जगत में मेरे लिए कुछ भी पुराना न रह जाएगा, क्योंकि जब मैं ही नवीन हो गया तो पुराने का स्मरण करने वाला भी न बचा, पुराने को देखने वाला भी न बचा। सब कुछ नवीन हो जाएगा। और भौतिकवादी कहता है कि चीजें नवीन करो, क्योंकि स्वयं के नवीन होने का तो कोई उपाय नहीं है। नवीन मकान बनाओ, नवीन सड़कें लाओ, नवीन कारखाने, नवीन व्यवस्था करो। सब नवीन कर लो।



।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।