संपादकीय

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ब्रह्मचारी गिरीश
संरक्षक संपादक

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जीवन एक संघर्ष है, यह एक नकारात्मक दृष्टिकोण है। वस्तुतः भारतीय संस्कृति एवं संस्कार जीवन के प्रतिपल को हर्ष व आनंद से भर देते है। वेद कहते है "जीवन आनंद है " संभवतः वेद हमें सामंजस्य की और इंगित करते है और वह सामंजस्य है ज्ञान, शक्ति और धन का जब कभी इन तीनो का संतुलन बिगड़ता है तो जीवन संघर्ष बन जाता है। अतः जब आप अपनी चेतना को जाग्रत कर लेते है, तो यह संतुलन बहुत ही सामान्य रूप से आपके सामान्य प्रयासों से कठिन से कठिन कार्य को गति प्रदान करता है एवं आपको , आपके जीवन लक्ष्य तक आनंदित हुए पहुंचाता है।


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चेतना का उत्सव

एक व्यापारी तीर्थाटन करते हुए एक जंगल से गुजर रहा था। उसके मन में यह संशय था, कि ईश्वर हैं या नहीं। वही उसने एक असहाय लोमड़ी को देखा। लोमड़ी के पैर नहीं थे, किंतु वह स्वस्थ थी। उसे आश्चर्य हुआ। तभी उसने मुंह में एक खरगोश दबाए शेर को आते देखा। भयभीत व्यापारी पेड़ पर चढ़ गया। उसने देखा कि शेर लोमड़ी के पास खरगोश छोड़कर चला गया, जिसे लोमड़ी खाने लगी। उसे विश्वास हो गया कि ईश्वर होते हैं, भगवान ने शेर के मन में दया उत्पन्न कर दी। अब उसने तय कर लिया कि मैं व्यर्थ ही झमेलों में पड़ा हूँ । भगवान ही मेरा भला करेंगें। काम-धाम छोड़कर व्यापारी वहीं बैठ गया। भूख-प्यास सताती रही, दिन-प्रतिदिन कमजोर होता रहा। एक दिन वह मरणासन्न हो गया। वहीं से एक संन्यासी गुजर रहे थे।
उन्हें उस पर दया आई पूछा- तुम्हारी यह स्थिति कैसे हुई? तो उसने पूरी कहानी कहदी और बोला- मुझे विश्वास हो गया था, कि ईश्वर हैं, किंतु अब तो लगता है, कि ईश्वर कहीं नहीं हैं। इस पर संन्यासी बोले- ईश्वर ने तो आपको शेर बनने का संदेश दिया था, किंतु आप लोमड़ी बनने लगे, तो इसमें ईश्वर का क्या दोष...? प्राय: ऐसा ही होता है- परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी सदैव कहा करते थे, कि "हम सभी जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय सुप्त अवस्था में ही ले लिया करते हैं, क्योंकि हमारी आंखे तो खुली होती हैं, परन्तु हमारी चेतना सुप्त अवस्था में रहती है।" तभी तो हम गलत मार्ग का चयन कर लेते हैं और सम्पूर्ण जीवन अपने लक्ष्य तक पहुंचने का प्रत्येक संभव प्रयास करते हैं और जब लक्ष्य प्राप्त नहीं होता तो, अंत समय में भगवान को दोष देते हैं। जबकि गलती हमारी होती है और हानि भी हमारी ही होती है।
अत: हमें सर्वप्रथम हमारी चेतना को जागृत करने का प्रयास करना चाहिये। जो सभी के लिए सम्ंभव एवं सरल भी परन्तु आवश्यकता मात्र आपके सच्चे प्रयास की है। परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी का यह उपरोक्त कथन अक्षरक्ष सत्य है एवं वर्तमान समय में लाखों-लाख सुधीजन अपने जीवन में उपरोक्त वाक्य के सामर्थ्यको अनुभव करते हुए और अनेक समूहों में प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। वर्तमान समय में विश्व के लगभग 100 से अधिक राष्ट्रों में लाखों साधक परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रतिपादित "भावातीत ध्यान- योगशैली" का प्रतिदिन प्रात: एवं संध्या को 15 से 20 मिनट अभ्यास कर अपने जीवन को और अधिक आनन्दित करते जा रहे हैं।
साथ ही चेतना को भी जागृत कर रहे हैं। जीवन संघर्ष है, यह एक नकारात्मक दृष्टिकोण है। वस्तुत: भारतीय संस्कृति एवं संस्कार जीवन के प्रतिपल को हर्ष व आनंद से भर देते हैं। वेद कहते हैं "जीवन आनंद है"। संभवत: वेद हमें सामंजस्य की और इगिंत करते हैं और वह सामंजस्य है ज्ञान, शक्ति एवं धन का जब कभी इन तीनों का संतुलन बिगड़ता है, तो जीवन संघर्ष बन जाता है। अत: जब आप अपनी चेतना को जागृत कर लेते हैं, तो यह संतुलन बहुत ही सामान्य रूप से आपके सामान्य प्रयासों से कठिन से कठिन कार्य को गति प्रदान करता है एवं आपको, आपके जीवन लक्ष्य तक आनंदित करते हुए पहुंचाता है। "दीपोत्सव" का पर्व भी हमें सही सन्देश देता है कि स्वयं को भीतर से प्रकाशित करें।
स्वयं को प्रकाशपुन्ज बनायें अत: सर्वप्रथम स्वयं को चेतनावान बनाने का प्रयास करें। एकमात्र जागृत चेतना ही आपको, आपके लिए उपयोगी और अनुपयोगी कार्यों के समझने का 'सार्मथ्य' प्रदान करेगी जिससे जीवन में पछतावा नहीं "आनंद" होगा क्योंकि "जीवन आनंद है।" आप सभी को दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनायें।



।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।