संपादकीय

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ब्रह्मचारी गिरीश
संरक्षक संपादक

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जीवन जीना एक कला है। जिसे ठीक प्रकार से जीना आ गया वह इस धरती का सिद्ध सम्मानित कलाकार है। उपलब्ध साधनासा मग्री का उत्कृष्ट प्रयोग कम करके जीवन धन्य कर सकना- यही तो कौशल की कसौटी है। पर्याप्त साधना के अभाव और प्रस्तुत अवरोधों की चर्चा में जो प्रस्तुत उपलब्धियों की महत्ता कम करना चाहता है और यह कहता है कि यदि अमुक साधन मिल सके होते, तो अमुक कर्तत्व करता-उसे आत्म-वञ्चना में निरत ही मानना चाहिए। जीवन- कला से अवगत कलाकार अपने स्वल्प साधनों से ही महान अभिव्यंजना प्रस्तुत करते रहे हैं। जिसे जीना आ गया उसे सब कुछ आ गया और वह अपने जीवन का सच्चा शिल्पी है- यह मानना चाहिए। भावातीत ध्यान योग भी वह सरलतम, सहजतम प्रक्रिया है जो आपको अपने जीवन का शिल्पी बनने का अवसर प्रदान करती है।


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मगंलाचरण

मानव-जीवन एक अमूल्य निधि है। यह बड़े सौभाग्य का सुअवसर है कि हम सृष्टि के किसी भी प्राणी को न मिल सकने योग्य सुअवसर को प्राप्त करें और मानव प्राणी कहलायें। यह अनुपम कुत्साओं की कीचड़ और कुण्ठाओं के दलदल में पड़े रहकर नारकीय यातनायें सहते हुए मृत्यु के दिन पूरे कर लेने के लिये नहीं है। वरन इसलिए है कि हम परमेश्वर की इस पुष्प प्रतिकृति विश्व के सौंदर्य का रसास्वादन करते हुए अपने को धन्य बनावें और इस प्रकार जियें, जिसमें पुष्प जैसे मृदुलता, चन्दन जैसी सुगन्ध और दीपक जैसी रोशनी भरी पड़ी हो। प्रतिदिन किसी भी कार्य के प्रारम्भ, मध्य और समाप्ति पर "मंगलाचरण'" अर्थात अपने इष्ट को उस कार्य के प्रारम्भ में आर्शीवाद एवं उस कार्य के निर्विघ्न पूर्ण होने के लिए प्रभु से उनके आर्शीवाद स्वरूप उनकी कृपा हेतु उनका आवाहन करना चाहिये। जब आपको अनुभूति हो कि हमारा कार्य मध्य स्थिति तक पहुंच गया है, तो हमें पुन: मंगलाचरण अर्थात अपने इष्ट को प्रारम्भ से मध्य तक पहुंचने हेतु कृतसता स्वरूप उनका धन्यवाद देना चाहिये एवं साथ ही, उक्त कार्य के पूर्णता तक प्रभु की कृपा का आर्शीवाद लेना चाहिये। जब आपको अनुभव हो कि हमने अपना कार्य पूर्ण कर लिया है और अब इस कार्य को समाप्त कर देना चाहिये अत: पुन: अपने इष्ट को उक्त सम्पूर्ण कार्य को समर्पित कर उसमें होने वाली त्रुटियों के लिये क्षमा मांगते हुए अपनी बुद्धि एवं क्षमता अनुसार आपकी पे्ररणा से मैने उक्त कार्य को पूर्ण किया यदि मुझसे कुछ त्रुटी हो गयी हो तो मुझे अज्ञानी जानकर मुझे क्षमा करने का कष्ट करें। उक्त "मंगलाचरण" का प्रावधान हमारी वैदिक परम्पराओं में आदेशित है मंगलाचरण में मुख्य रूप से पार्वति पुत्र, भगवान गणेश की आराधना की जाती है और किसी भी कार्य का ''श्री गणेश'' किया जाता है। जो स्वयं ही अनिष्ट को समाप्त करते हुए सद् बुद्धि के दाता हैं। जिनके स्मरण मात्र से अनेकानेक उन समस्याओं का क्षय: हो जाता है जो भविष्य में जन्म ले सकती है उन समस्याओं का दमन भविष्य के गर्भ में ही करने क्षमता रखते है गिरजानंदन गणेश साथ ही माता सरस्वती का भी आवाहन किया जाता है क्योंकि किसी भी कार्य को करने हेतु में कार्य से सम्बन्धित जिस ज्ञान की आवश्यकता होती है, उसकी देवी मां सरस्वती ही तो हैं जो हमें उस कार्य उद्देश्य पूर्ती हेतु हमें प्रेरित तथा प्रोत्साहित करती है। और शुद्ध ज्ञान प्रदान कर हमारा मार्ग प्रशस्त करती हैं। जीवन जीना एक कला है। जिसे ठीक प्रकार से जीना आ गया वह इस धरती का सिद्ध सम्मानित कलाकार है। उपलब्ध साधना-सामग्री का उत्कृष्ट प्रयोग कम करके जीवन धन्य कर सकना-यही तो कौशल की कसौटी है। पर्याप्त साधना के अभाव और प्रस्तुत अवरोधों की चर्चा में जो प्रस्तुत उपलब्धियों की महत्ता कम करना चाहता है और यह कहता है कि यदि अमुक साधन मिल सके होते, तो अमुक कर्तत्व करता-उसे आत्म-वञ्चना में निरत ही मानना चाहिए। जीवन-कला से अवगत कलाकार अपने स्वल्प साधनों से ही महान अभिव्यंजना प्रस्तुत करते रहे हैं। जिसे जीना आ गया उसे सब कुछ आ गया और वह अपने जीवन का सच्चा शिल्पी है- यह मानना चाहिए। भावातीत ध्यान योग भी वह सरलतम, सहजतम प्रक्रिया है जो आपको अपने जीवन का शिल्पी बनने का अवसर प्रदान करती है। स्वयं की शक्तियों और क्षमताओं से अवगत कराते हुए आपको आनन्दित करती है।



।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।