संपादकीय

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ब्रह्मचारी गिरीश
संरक्षक संपादक

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जीवन में कुछ भी व्यर्थ नहीं है सभी में कुछ न कुछ अर्थ है। आपका व्यवहार ही आपको संघर्ष या उत्सव में धकेलता है। यदि जीवन को आप संघर्ष समझेंगे तो संघर्ष बन जाएगा और यदि इसे खेल भावना से लेंगे तो यह उत्सव बन जाएगा। दूसरा यह कि उनके लिए जीवन एक संघर्ष है जो उन वस्तुओं के बारे में सोचते रहते हैं जो उनके पास नहीं है जबकि उनके लिए उत्सव जो यह सोचते हैं कि मेरे पास जो है उसका कितना आनंद ऊठाएं।


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जीवन : संघर्ष, खेल या उत्सव

परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी सदैव कहते थे जीवन संघर्ष नहीं ''जीवन आनंद है।'' जीवन को संघर्ष मानना पश्चिमी सोच है। भारतीय सनातन परंपरा जीवन को एक उत्सव मानती है। जीवन में कुछ भी व्यर्थ नहीं है सभी में कुछ न कुछ अर्थ है। आपका व्यवहार ही आपको संघर्ष या उत्सव में धकेलता है। यदि जीवन को आप संघर्ष समझेंगे तो संघर्ष बन जाएगा और यदि इसे खेल भावना से लेंगे तो यह उत्सव बन जाएगा। दूसरा यह कि उनके लिए जीवन एक संघर्ष है जो उन वस्तुओं के बारे में सोचते रहते हैं जो उनके पास नहीं है जबकि उनके लिए उत्सव जो यह सोचते हैं कि मेरे पास जो है उसका कितना आनंद ऊठाएं। एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा- 'गुरुजी, कुछ लोग कहते हैं कि जीवन एक संघर्ष है, कुछ कहते हैं कि जीवन एक खेल है और कुछ जीवन को एक उत्सव मानते हैं। अत: इनमें से सही कौन है' गुरुजी ने कहा, जिन्हें गुरु नहीं मिला उनके लिए जीवन एक संघर्ष है; जिन्हें गुरु मिल गया उनका जीवन एक खेल है और जो लोग गुरु द्वारा बताए गए मार्ग पर चलने लगते हैं, उनके लिए जीवन एक उत्सव है। शिष्य को गुरुजी का यह साधारणसा उत्तर समझ में नहीं आया और वह इससे संतुष्ट नहीं हुआ तो गुरुजी ने एक कहानी सुनाई। एक बार किसी गुरुकुल में तीन शिष्यों ने अपना अध्ययन सम्पूर्ण करने पर अपने गुरुजी से यह बताने के लिए विनती की कि उन्हें गुरुदाक्षिणा में, उनसे क्या चाहिए। गुरुजी पहले तो मन ही मन मुस्कराए और फिर बोले- 'मुझे तुमसे गुरुदक्षिणा में एक थैला भरके सूखी पत्तियां चाहिए, ला सकोगे'' यह सुनकर वह तीनों प्रसन्न हो गए, क्योंकि उन्हें लगा कि ये बड़ा ही सरल कार्य है। अब वे तीनों शिष्य पास के ही एक जंगल में पहुंच गए। परंतु यह देखकर उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि यहां तो सूखी पत्तियां मात्र एक मुट्ठी भर ही हैं। वे सोच में पड़ गए कि आखिर जंगल से कौन सूखी पत्तियां उठा कर ले गया होगा? सूखी पत्तियां का भला क्या उपयोग' तभी उन्हें दूर से एक किसान आता दिखाई दिया। वे उसके पास पहुंचकर याचना करने लगे कि वह उन्हें मात्र एक थैला भर सूखी पत्तियां दे दें। उस किसान से क्षमा मांगते हुए कहा कि मैं आप लोगों की सहायता नहीं कर सकता क्योंकि सूखी पत्तियों को ईंधन और खाद के रूप में पहले ही उपयोग कर लिया गया है। यह सुनकर वे तीनों पास के एक गांव में चले गए। वहां पहुंचकर उन्होंने जब एक व्यापारी को देखा और उससे थैला भर सूखी पत्तियां देने के लिए प्रार्थना करने लगे परंतु व्यापारी ने उसके पास सूखी पत्तियां होने से मना कर दिया और कहा कि वो तो मैंने कभी की बेच दी। फिर भी उस व्यापारी ने कहा कि मैं जानता हूं उस बूढ़ी मां को जो जंगल से सूखी पत्तियां बीनकर लाती हैं। हो सकता है कि उसके पास हो। तीनों उस बूढ़ी मां के पास गए जो उन पत्तियों को अलग-अलग करके कई प्रकार की औषधियां बनाया करती थीं। उसने भी इनकार कर दिया और कहा कि यह तो औषधियां बनाने के लिए है। वहां भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। वे निराश होकर खाली हाथ गुरुकुल लौट आए। गुरुजी ने उन्हें देखते ही पूछा- 'ले आए गुरुदक्षिणा'' तीनों ने सिर झुका लिया। गुरुजी के फिर से पूछे जाने पर उनमें से एक शिष्य बोला- 'गुरुदेव! हम आपकी इच्छा पूरी नहीं कर पाए। हमने सोचा था कि सूखी पत्तियां तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही होंगी परंतु बड़े ही आश्चर्य की बात है कि लोग उनका भी कितनी प्रकार से उपयोग करते हैं। गुरुजी फिर पहले ही के समान मन ही मन मुस्कराए और बोले- निराश क्यों होते हो? प्रसन्न हो जाओ और यही ज्ञान कि सूखी पत्तियां भी व्यर्थ नहीं हुआ करतीं बल्कि उनके भी अनेक उपयोग हुआ करते हैं, मुझे गुरु दक्षिणा के रूप में दे दो। तीनों शिष्य गुरुजी को प्रणाम करके प्रसन्न होकर अपने-अपने घर चले गए। वह शिष्य जो गुरुजी की कहानी सुन रहा था। बड़े उत्साह से बोला- 'गुरु जी, अब मुझे आपकी बात समझ में आई कि आप क्या कहना चाहते हैं। आपका संकेत, वस्तुत: इसी ओर है कि जब सर्वत्र सुलभ सूखी पत्तियां भी निरर्थक या बेकार नहीं होती हैं तो फिर हम कैसे, किसी भी वस्तु या व्यक्ति को छोटा और महत्त्वहीन मानकर उसका तिरस्कार कर सकते हैं? जीवन में हमारे पास जो है हम उसका आनंद ले सकते हैं जबकि कुछ लोग उनके पास जो नहीं है उसके बारे में सोचकर ही व्यथित होते रहते हैं। गुरुजी भी तुरंत बोले- 'हां, मेरे कहने का भी यही तात्पर्य है कि हम जब भी किसी से मिलें तो उसे यथायोग्य मान देने का भरसक प्रयास करें जिससे आपस में स्नेह, सद्भावना, सहानुभूति एवं सहिष्णुता का विस्तार होता रहे और हमारा जीवन संघर्ष के बजाय उत्सव बन सके। हमारा निर्णय हमारी चेतना पर आधारित होता है किन्तु जीवन में हम अधिकतर निर्णय चेतना की सुप्तावस्था में करते हैं। अत: चेतना को जागृत रखने के लिये नियमित रूप से प्रतिदिन प्रात: एवं संध्या को ''भावातीत-ध्यान-योग'' का 10 से 15 मिनट अभ्यास आवश्यक है। यह हमारे जीवन संघर्ष की सोच को ''जीवन आनंद है।'' में परिवर्तित कर हमारे जीवन को आनन्द से भर देगा।



।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।