संपादकीय

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ब्रह्मचारी गिरीश
संरक्षक संपादक

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नियमित "भावातीत ध्यान" एक साधारण व्यक्ति का रूपान्तरण एक विशिष्ट व्यक्ति के रूप में रूपान्तरित होने की प्रक्रिया है और सबसे अद्भुत तो उसकी आनंद से परिपूर्ण अनुभूति होती है और आप उससे पूर्ण हो जाते हैं। सदैव स्वयं आनंदित रहते हैं और एक सुगंधित पुष्प के समान हो जाते हैं जिसकी सुगंध, प्रत्येक व्यक्ति ले सकता है। अत: "भावातीत ध्यान" का नियमित अभ्यास कीजिये। स्वयं को अनिर्णय की इस स्थिति से बाहर निकालिये।


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अपने-अपने कर्म, अपना-अपना फल

कृष्ण सुदामा की मित्रता का एक सुन्दर प्रसंग याद आता है। सुदामा अपने परममित्र से प्रश्न करते हैं कि सब कुछ अपने कर्मों का ही फल है- तुम और मैं एक ही आश्रम में पले-बढ़े, एक गुरु से दीक्षा ली किन्तु मैं एक दरिद्र ब्राह्म्ण और तुम द्वारकाधीश हो यह सब कैसे हो सकता है। हम एक ही परिवेश में शिक्षित हुए फिर यह असमानता क्यों कृष्ण? कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा कि "सुदामा हमारा जीवन हमारे ही कर्मों का फल है। अत: प्रत्येक क्षण हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि हम क्या कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं? एवं इसका परिणाम क्षणिक लाभदायक है या दीर्घकाल तक लाभकारी रहेगा। अर्थात् यह उचित है या अनुचित सदैव ध्यान रखना आवश्यक है।' जहां तक तुम्हारा प्रश्न है, तो सुनो हम प्रत्येक दिन आश्रम की गायों को चराने जंगल जाया करते थे और गुरुमाता हमारे साथ कुछ चने बांध दिया करती थीं, हमारे स्वल्पाहार के लिये। एक दिन मैं तुमसे थोड़ा पहले निकल गया था तब गुरुमाता ने तुम्हें मेरे हिस्से के चने दे दिये थे जो तुमने अपने गमछे के एक छोर पर तुम्हारे चने और दूसरे छोर पर मेरे चने बांध लिये थे। किंतु तुमने मेरे हिस्से के चने मुझे नहीं दिये और तुम मेरे हिस्से के चनों को धीरे-धीरे खा रहे थे। मैंने आपसे पूछा भी कि तुम यह क्या खा रहे हो? तो तुमने मुझे नहीं बताया। तो यह जो तुमने मेरे हिस्से के चने खाये तो वो अनुचित था। अत: उसके प्रतिफल में तुम्हें मेरे हिस्से के दु:ख मिले और तुम्हारे भाग के सुख मुझे मिले। परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी सदैव कहते थे कि हम अपने सम्पूर्ण जीवन में अनेक निर्णायक निर्णय अवचेतन अवस्था में ही ले लिया करते हैं। अत: हमें सदैव ही चेतन अवस्था में रहना चाहिये। अर्थात प्रत्येक कार्य को करने के पहले हमें यह विचार करना चाहिये कि यह उचित है या अनुचित। सामान्य मनुष्य इतना विचार करने की स्थिति में नहीं रहता एवं समय के दवाब में कार्य को कार्यान्वित कर देता है। क्योंकि उसकी चेतना जागृत अवस्था में नहीं रहती है। अत: "भावातीत ध्यान" योग-शैली का नियमित प्रात:-संध्या 15 से 20 मिनट अभ्यास करने से हमारी चेतना विश्रामपूर्ण जागृति की चैतन्य स्थिति में आ जाती है और निरन्तर अभ्यास से अभ्यासकर्ता को यह अनुभव होने लगता है कि अब वह जो भी कार्य करता है वह उसे पूर्ण रूप से सोच-विचार कर एवं अपने पूर्ण सामर्थ्य एवं आत्मविश्वास से करता है, तो निश्चित रूप से उसका परिणाम आनंद से परिपूर्ण होता है। नियमित "भावातीत ध्यान" एक साधारण व्यक्ति का रूपान्तरण एक विशिष्ट व्यक्ति के रूप में रूपान्तरित होने की प्रक्रिया है और सबसे अद्भुत तो उसकी आनंद से परिपूर्ण अनुभूति होती है और आप उससे पूर्ण हो जाते हैं। सदैव स्वयं आनंदित रहते हैं और एक सुगंधित पुष्प के समान हो जाते हैं जिसकी सुगंध, प्रत्येक व्यक्ति ले सकता है। अत: "भावातीत ध्यान" का नियमित अभ्यास कीजिये। स्वयं को अनिर्णय की इस स्थिति से बाहर निकालिये।



।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।