संपादकीय

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ब्रह्मचारी गिरीश
संरक्षक संपादक

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यदि आप आनंदित होकर कोई कार्य करते हैं, तो आपको परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं होती। इस विश्व में सबसे कठिन कार्य जीवन में प्रसन्न न होने पर भी निरंतर स्वयं को अत्यधिक प्रसन्न दिखाने का प्रयास करना है। इस प्रकार का दिखावा करने में बड़ी मात्रा में जीवन ऊर्जा लगती है। लोग कृत्रिम हँसी और आनंद बनाए रखते हैं, जिससे उन्हें अधिक ऊर्जा व्यय करने पड़ती है, इससे गंभीर रोग भी हो सकते हैं। अत: जीवन को अविरल आनंद से भरने के लिए प्रतिदिन प्रात: व संध्या को भावातीत ध्यान-योग- शैली का 15 से 20 मिनट का नियमित अभ्यास आपको और आपके परिवार को आनंद से सराबोर कर देगा।


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आनंदित होकर कार्य करें

आशा ही जीवन है और जीवन ही आनंद है। आप जिनता नकारात्मकता अनुभव करेंगें, उतना ही लोगों के साथ की आवश्यकता का आभास होगा। किंतु आप जितना प्रसन्न होंगे, आप अंदर से उतना ही उल्लासित और उत्साहित अनुभव करते हैं। किसी भी व्यक्ति में उल्लास को उत्पन्न नहीं किया जा सकता। अगर वह ओढ़ा हुआ या कृत्रिम रूप से बनाया उल्लास है तो नि:संदेह आपको लोगों के साथ की आवश्यकता होगी। प्राय: लोग उल्लास या आनंद का अर्थात् संगीत सुनना, नाचना और झूमना समझते हैं, जबकि आप शांति से परविार के सथा बैठकर भी आनंद का अनुभव कर सकते हैं। वर्तमान समय में परिवार को एकजुट रखना बड़ी चुनौती है। छोटी-छोटी बात पर परिवार के सदस्यों में मनमुटाव हो जाता है। शास्त्रों में बनाए गए वो 3 प्रसंग, जिन्हें ध्यान में रखकर परिवार की एकता बनाए रख सकते हैं। आज के समय में हर कोई सबसे पहले स्वयं के हित के बारे में सोचता है और परिवार के हित के बारे में बाद में। यही सोच परिवारों में मनमुटाव बढ़ाती है। यदि आप स्वयं के हित के ऊपर परिवार के बारे में सोचेंगे तो परिवार के अन्य सदस्यों की दृष्टि आपके प्रति सकारात्मक होगी और परिवार टूटने से बच जाएगा। परिवार के सदस्यों में मनमुटाव तब भी बढ़ता है जब कुछ लोगों को अभिव्यक्ति अर्थात् अपने विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता न हो। प्राय: देखने में आता है कि परिवार के कुछ सदस्य तो अपनी बात जिद करके मनवा लेते हैं, किंतु कुछ सदस्य अपनी बात तक ठीक से नहीं रख पाते, ऐसी स्थिति आगे जाकर किसी बड़ी समस्या का कारण बन सकती है। अत: परिवार के प्रत्येक सदस्य को अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। रामायण में लक्ष्मण जी को श्रीराम जी की सेवा प्रिय है। वो सोते-जागते प्रत्येक पल श्रीराम जी की सेवा में लीन हैं, किंतु उनके ही छोटे भाई शत्रुघ्न जी भरत जी की परछाई हैं। शत्रुघ्न जी का पूरा जीवन भरत की सेवा में गुजरा। लक्ष्मण जी ने कभी अपनी पसंद शत्रुघ्न जी पर नहीं थोपी कि तुम श्रीराम जी की सेवा में रहो। जब श्रीराम जी वनवास गए तो संभव था कि लक्ष्मण जी क्रोध में शत्रुघ्न जी को भरत जी से अलग कर देते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। लक्ष्मण जी ने शत्रुघ्न को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की। घर का मुखिया मात्र परिवार ही नहीं चलाता है, उसके कर्मों पर परिवार का भविष्य टिका होता है। मुखिया पंक्ति में खड़े पहले व्यक्ति के समान होता है। वह जैसा खड़ा होता है, कतार में शेष लोग भी वैसे ही खड़े होते हैं। परिवार चलाना भी ऐसा ही कार्य है। श्रीराम जी परिवार के मुखिया का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। राजा दशरथ जी की मृत्यु के बाद श्रीराम जी ही सबसे बड़े पुत्र होने के नाते परिवार के मुखिया थे। वनवास के समय श्रीराम जी ने भरत जी को धर्म के अनुसार राज्य चलाने के लिए प्रेरित किया और शत्रुघ्न जी को भी भरत जी की आज्ञा मानने के लिए कहा। वनवास से लौटने के बाद श्रीराम जी ने सभी भाईयों को अलग-अलग राज्य स्थापित करवाया जिससे भविष्य में किसी के मन में राज्य को लेकर दुराभाव न उत्पन्न हो। लक्ष्मण जी, भरत जी व शत्रुघ्न जी ने श्रीराम जी को ही अपना आदर्श मान कर अपने-अपने राज्यों में रामराज्य की स्थापना की। अत: यदि आप आनंदित होकर कोई कार्य करते हैं, तो आपको परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं होती। इस विश्व में सबसे कठिन कार्य जीवन में प्रसन्न न होने पर भी निरंतर स्वयं को अत्यधिक प्रसन्न दिखाने का प्रयास करना है। इस प्रकार का दिखावा करने में बड़ी मात्रा में जीवन ऊर्जा लगती है। लोग कृत्रिम हँसी और आनंद बनाए रखते हैं, जिससे उन्हें अधिक ऊर्जा व्यय करने पड़ती है, इससे गंभीर रोग भी हो सकते हैं अत: जीवन को अविरल आनंद से भरने के लिए प्रतिदिन प्रात: व संध्या को भावातीत ध्यान-योग-शैली का 15 से 20 मिनट का नियमित अभ्यास आपको और आपके परिवार को आनंद से सराबोर कर देगा।



।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।