संपादकीय

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ब्रह्मचारी गिरीश
संरक्षक संपादक

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महात्मा ने कहा : थोड़ा और आगे सोने का भण्डार है और ऐसे कहानी चलती है। फिर और आगे हीरों की खदान है। और ऐसे कहानी चलती है और एक दिन महात्मा ने कहा कि नासमझ, अब तू हीरों पर ही रुक गया? अब तो उस लकड़हारे को भी बड़ी अकड़ आ गई, बड़ा धनी भी हो गया था, महल खड़े कर लिए थे। उसने कहा अब छोड़ो, अब तुम मुझे परेशांन न करो। अब हीरों के आगे क्या हो सकता है? उस महात्मा ने कहा हीरों के आगे मैं हूं। तुझे यह कभी ध्यान नहीं आया कि यह व्यक्ति यहां बैठा है, जिसे पता है हीरों की खदान का, वह हीरे नहीं भर रहा है, इसको अवश्य कुछ और आगे मिल गया होगा! हीरों से भी आगे इसके पास कुछ होगा, तुझे कभी यह प्रश्न क्यों नहीं सूझा? रोने लगा वह आदमी। सिर पटक दिया चरणों पर। कहा कि मैं कैसा मूढ़ हूं मुझे यह प्रश्न ही नहीं आता। आप जब बताते हो, तब मुझे याद आता है। यह तो मेरे जन्मों-जन्मों में नहीं आ सकता था कि आपके पास हीरों से भी बड़ा कोई धन है। महात्मा ने कहा : उसी धन का नाम ध्यान है। अब खूब तेरे पास धन है, अब धन की कोई आवश्यकता नहीं। अब क्षणिक अपने भीतर की खदान खोजें, जो सबसे मूल्यवान है।


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क्षण भर स्वयं के भीतर खोजें

एक महात्मा जो एक वृक्ष के नीचे ध्यान कर रहे थे, प्रतिदिन एक लकड़हारे को लकड़ी काटते ले जाते देखते थे। एक दिन उन्होंने कहा कि सुन भाई, दिन-भर लकड़ी काटते हो, दो जून रोटी भी नहीं जुट पाती। तुम जरा आगे क्यों नहीं जाते। वहां आगे चंदन का जंगल है। एक दिन काट लेना, सात दिन के भोजन के लिए बहुत हो जाएगा। निर्धन लकड़हारे को विश्वास तो नहीं हुआ, क्योंकि वह तो सोचता था कि जंगल को जितना वह जानता है और कौन जानता है? जंगल में ही तो जीवन बीता है। लकड़ियां काटते ही तो जीवन बीता। यह महात्मा यहां बैठे हुए हैं वृक्ष के नीचे, इसको क्या पता होगा? मानने का मन तो न हुआ, किंतु फिर सोचा कि इनकी बात मान लेने में समस्या भी नहीं है। फिर झूठ कहेगें भी क्यों? शांत व्यक्ति मालूम पड़ता है, आनन्दित व्यक्ति मालूम पड़ता है। कभी वह बोले भी नहीं इसके पहले। एक बार प्रयोग करके देख लेना चाहिये। तो वो गया। लौटा तो महात्मा के चरणों में सिर रखा और कहा कि मुझे क्षमा करना, मेरे मन में बड़ा संदेह आया था, क्योंकि मैं तो सोचता था कि मुझसे अधिक जंगल कौन जानता है।

मगर मुझे चंदन की पहचान ही न थी। मेरे पिता भी लकड़हारे थे, उनके पिता भी लकड़हारे थे। हम यही काटने की, जलाऊ-लकड़ियां काटते-काटते अपना जीवन व्यतित करा, हमें चंदन का पता न था, चंदन की पहचान क्या! हमें तो चंदन मिल भी जाता तो भी हम काटकर बेच आते उसे बाजार में ऐसे ही। आपने पहचान बताई, अपने गंध से पहचान कराई, आपने परखने का ज्ञान दिया। मैं भी कैसा अभागा! सम्भवत:, पहले पता चल जाता! महात्मा ने कहा कोई चिंता न करो, जब पता चला तभी ठीक है। जब घर आ गए तभी सबेरा है। दिन बड़े आनन्द में कटने लगे। एक दिन काट लेता, सात-आठ दिन, दस दिन जंगल आने की आवश्यकता ही न रहती। एक दिन महात्मा ने कहा; मेरे भाई, मैं सोचता था कि तुम्हें कुछ बुद्धि आएगी। जीवन-भर तुम लकड़ियां काटते रहे, आगे न गए; तुम्हें कभी यह प्रश्न नहीं उठा कि इस चंदन के आगे भी कुछ हो सकता है? उसने कहा; यह तो मुझे प्रश्न ही न आया। क्या चंदन के आगे भी कुछ है? उस महात्मा ने कहा : चंदन के थोड़ा आगे जाओ तो वहां चांदी की खदान है। लकड़ियां-चंदन काटना छोड़ो। एक दिन ले आओगे, दो-चार छ: महीने के लिए हो गया। अब तो विश्वास आया था। भागा। संदेह भी न उठाया। चांदी पर हाथ लग गए, तो कहना ही क्या! चांदी ही चांदी थी! चार-छ: महीने नदारद हो जाता। एक दिन आ जाता, फिर नदारद हो जाता। किंतु व्यक्ति का मन ऐसा मूढ़ है कि फिर भी उसे ध्यान न आया कि और आगे कुछ हो सकता है।

संत ने एक दिन कहा कि तुम कभी जागोगे कि नहीं, कि मुझी को तुम्हें जगाना पड़ेगा। आगे सोने की खदान है मूर्ख! तुझे स्वयं अपनी ओर से प्रश्न, जिज्ञासा, मुमुक्षा कुछ नहीं उठती कि जरा और आगे देख लूं? अब छह महीने मस्त पड़ा रहता है, घर में कुछ कार्य भी नहीं है, फुरसत है। क्षणिक जंगल में आगे देखकर देखूं यह ध्यान में नहीं आता? उसने कहा कि मैं भी मंदभागी, मुझे यह ध्यान ही न आया, मैं तो समझा चांदी, बस अंतिम बात हो गई, अब और क्या होगा? गरीब ने सोना तो कभी देखा न था, सुना था। महात्मा ने कहा : थोड़ा और आगे सोने का भण्डार है। और ऐसे कहानी चलती है। फिर और आगे हीरों की खदान है और ऐसे कहानी चलती है और एक दिन महात्मा ने कहा कि नासमझ, अब तू हीरों पर ही रुक गया? अब तो उस लकड़हारे को भी बड़ी अकड़ आ गई, बड़ा धनी भी हो गया था, महल खड़े कर लिए थे। उसने कहा अब छोड़ो, अब तुम मुझे परेशांन न करो। अब हीरों के आगे क्या हो सकता है? उस महात्मा ने कहा हीरों के आगे मैं हूं। तुझे यह कभी ध्यान नहीं आया कि यह व्यक्ति यहां बैठा है, जिसे पता है हीरों की खदान का, वह हीरे नहीं भर रहा है, इसको अवश्य कुछ और आगे मिल गया होगा! हीरों से भी आगे इसके पास कुछ होगा, तुझे कभी यह प्रश्न क्यों नहीं सूझा? रोने लगा वह आदमी। सिर पटक दिया चरणों पर। कहा कि मैं कैसा मूढ़ हूं मुझे यह प्रश्न ही नहीं आता। आप जब बताते हो, तब मुझे याद आता है। यह तो मेरे जन्मों-जन्मों में नहीं आ सकता था कि आपके पास हीरों से भी बड़ा कोई धन है। महात्मा ने कहा : उसी धन का नाम ध्यान है। अब खूब तेरे पास धन है, अब धन की कोई आवश्यकता नहीं। अब क्षण भर अपने भीतर की खदान खोजों, जो सबसे मूल्यवान है। आपकी स्वयं की खोज में आपकी यात्रा का सहयात्री और मार्गदर्शक है परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रणीत "भावातीत-ध्यान-योग-शैली"। अत: नियमित प्रात: संध्या अभ्यास करें और स्वयं को खोजें।



।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।