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देहबोध से जीवनबोध और आत्मबोध तक

क्या हमारी देह जड़ है? क्या उसमें दिव्य चेतना की जड़ें सुप्तावस्था में हैं? या फिर जन्म- जन्मान्तरों की अतृप्त कामनाओं और वासनाओं का कूड़ा-करकट उन पर पड़ा है? अनन्त प्रतीतियों की खरपतवार? कहां से आयेगा वह बासंती जल जो इस जड़ में फूंकेगा चेतना की संजीवनी? कस्तूरी-मृग में अंतरनिहित कस्तूरी की भांति, प्रज्ञावान बताते हैं, यह संजीवनी हमारे भीतर ही है। प्राप्ति की तड़प को अंग्रेजी में क्रेविंग कहते हैं। त्रिवर्ग है हमारा तंत्रिका तंत्र। उसमें धर्म, अर्थ, काम है और सत, रज, तम भी है। ज्ञानी- ध्यानी कहते हैं कि अपने तंत्रिका तंत्र में जहां भी ध्यान रमाओगे वहीं से संबंधित क्रेविंग का अन्त:स्फुरण होने लगेगा।

 महर्षि महेश योगी ने हमारी अनादि ऋषि- परंपरा के तारतम्य में हमें अपने देह मंदिर को पहचानने के सूत्र दिये हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक 'द आर्ट ऑफ़ लिविंग एंड साइंस ऑफ़ बीइंग' में 'देह व्याधिमंदिरम्' के रूढ़िगत विचार को 'देह देव मंदिरम' में बदलने के मत का अद्भुत प्रतिपादन किया है। वे देहबोध के प्रसंग में ?साइंस ऑफ़ बीइंग' की व्याख्या करते हैं और जीवनबोध के अर्थ-संदर्भों को समझाते हुये 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' की बात करते हैं। तंत्रिका तंत्र के बिन्दुओं तक पहुंचने के लिये महर्षि ने भावातीत ध्यान का सूत्र दिया। उसे बोधगम्य बनाने के लिये योग-संदर्भ में गीता का भाष्य भी लिखा। क्या है ध्यान? क्या है योग?


।।जय गुरूदेव, जय महर्षि।।


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